अद्वैत प्रकरण - कारिका 46

यदा न लीयते चित्तं न च विक्षिप्यते पुनः ।
अनिङ्गनमनाभासं निष्पन्नं ब्रह्म तत्तदा ॥ ४६ ॥

yadā na līyate cittaṃ na ca vikṣipyate punaḥ .
aniṅganamanābhāsaṃ niṣpannaṃ brahma tattadā .. 46 ..


जिस समय चित्त सुषुप्ति में लीन न हो और फिर विक्षिप्त भी न हो तथा निश्चल और विषयाभास से रहित हो जाय उस समय वह ब्रह्म ही हो जाता है ॥ ४६ ॥
उपर्युक्त उपाय से निग्रह किया हुआ चित्त जिस समय सुषुप्ति में लीन नहीं होता और न फिर विषयों में ही विक्षिप्त होता है तथा वायुशून्य स्थान में रखे हुए दीपक के समान निश्चल और अनाभास अर्थात् जो किसी भी कल्पित विषयभाव से प्रकाशित नहीं होता—ऐसा जिस समय यह चित्त हो जाता है उस समय वह ब्रह्म ही हो जाता है, अर्थात् उस अवस्था में चित्त ब्रह्मरूप से निष्पन्न हो जाता है ॥ ४६ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
यथोक्तोपायेन निगृहीतं चित्तं यदा सुषुप्ते न लीयते न च पुनर्विषयेषु विक्षिप्यते, अनिङ्गनमचलं निवातप्रदीपकल्पम्, अनाभासं न केनचित् कल्पितेन विषयभावेनावभासत इति, यदैवंलक्षणं चित्तं तदा निष्पन्नं ब्रह्म ब्रह्मस्वरूपेण निष्पन्नं चित्तं भवतीत्यर्थः ॥ ४६ ॥