एतत्तदुत्तमं सत्यं यत्र किञ्चिन्न जायते ॥ ४८ ॥
na kaścijjāyate jīvaḥ sambhavo’sya na vidyate .
etattaduttamaṃ satyaṃ yatra kiñcinna jāyate .. 48 ..
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इति श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीशङ्करभगवतः कृतौ गौडपादीयागमशास्त्रभाष्येऽद्वैताख्यं तृतीयं प्रकरणम् ॥ ३ ॥
॥ हरिः ॐ तत्सत् ॥
अलातशान्तिप्रकरण
ओङ्कार के निर्णयद्वारा आगमप्रकरण में प्रतिज्ञा किये अद्वैत का—जिसे कि [वैतथ्यप्रकरण में] बाह्य विषयभेद के मिथ्यात्वद्वारा सिद्ध किया है और फिर अद्वैतप्रकरण में शास्त्र और युक्तियों से साक्षात् निश्चय किया है, [पिछले प्रकरण के] अन्त में ‘एतदुत्तमं सत्यम्’ ऐसा कहकर उपसंहार किया गया । वेद के तात्पर्यभूत इस अद्वैतदर्शन के विरोधी जो द्वैतवादी और वैनाशिक (बौद्ध आदि) हैं उनके दर्शन परस्पर विरोधी होने के कारण रागद्वेषादि क्लेशों के आश्रय हैं, अतः उनका मिथ्यादर्शनत्व सूचित होता है । और रागद्वेषादि क्लेशों का आश्रय न होने के कारण अद्वैतदर्शन ही सम्यग्दर्शन है—इस प्रकार उसकी स्तुति की जाती है । अब यहाँ, परस्पर विरोधी होने के कारण विस्तारपूर्वक उन (द्वैतवादी आदि दार्शनिकों के दर्शन)-का मिथ्यादर्शनत्व प्रदर्शित कर उनके प्रतिषेधद्वारा आवीतन्यायसे अद्वैतदर्शन की सिद्धि का उपसंहार करना है—इसीलिये अलातशान्तिप्रकरण का आरम्भ किया जाता है ।
उसमें अद्वैतदर्शनसम्प्रदाय के कर्ता को अद्वैतरूप से ही नमस्कार करने के लिये यह पहला श्लोक है, क्योंकि शास्त्र के आरम्भ में आचार्य की पूजा अभिप्रेत अर्थ की सिद्धि के लिये इष्ट ही है ।
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ओङ्कारनिर्णयद्वारेणागमतः प्रतिज्ञातस्याद्वैतस्य प्रकरणप्रयोजनम् बाह्यविषयभेदवैतथ्याच्च सिद्धस्य पुनरद्वैते शास्त्रयुक्तिभ्यां साक्षान्निर्धारितस्यैतदुत्तमं सत्यमित्युपसंहारः कृतोऽन्ते । तस्यैतस्यागमार्थस्याद्वैतदर्शनस्य प्रतिपक्षभूता द्वैतिनो वैनाशिकाश्च तेषां चान्योन्यविरोधाद्रागद्वेषादिक्लेशास्पदं दर्शनमिति मिथ्यादर्शनत्वं सूचितम् । क्लेशानास्पदत्वात्सम्यग्दर्शनमित्यद्वैतदर्शनं स्तूयते । तदिह विस्तरेणान्योन्य-विरुद्धतयाऽसम्यग्दर्शनत्वं प्रदर्श्य तत्प्रतिषेधेनाद्वैतदर्शनसिद्धिरुपसंहर्त- व्यावीतन्यायेनेत्यलातशान्ति-रारभ्यते ।
तत्राद्वैतदर्शनसम्प्रदायकर्तुरद्वैत-स्वरूपेणैव नमस्कारार्थोऽयमाद्यश्लोकः । आचार्यपूजा ह्यभिप्रेतार्थसिद्ध्यर्थेष्यते शास्त्रारम्भे ।