अद्वैत प्रकरण - कारिका 5

यथैकस्मिन्घटाकाशे रजोधूमादिभिर्युते ।
न सर्वे संप्रयुज्यन्ते तद्वज्जीवाः सुखादिभिः ॥ ५ ॥

yathaikasminghaṭākāśe rajodhūmādibhiryute .
na sarve saṃprayujyante tadvajjīvāḥ sukhādibhiḥ .. 5 ..


जिस प्रकार एक घटाकाश के धूलि और धुएँ आदि से युक्त होने पर समस्त घटाकाश उनसे युक्त नहीं होते उसी प्रकार जीव भी सुखादि धर्मों से लिप्त नहीं होते । [अर्थात् एक जीव के सुखादिमान् होने पर सब जीव सुखादिमान् नहीं हो जाते] ॥ ५ ॥

जिस प्रकार एक घटाकाश के धूलि और धुएँ से युक्त होने पर समस्त घटाकाशादि उस धूलि और धुएँ से संयुक्त नहीं होते उसी प्रकार जीव भी सुखादि से लिप्त नहीं होते ।

पूर्व०—आत्मा तो एक ही है न?

सिद्धान्ती—हाँ, क्या तूने यह नहीं सुना कि सम्पूर्ण संघातों में आकाश के समान व्याप्त एक ही आत्मा है?

पूर्व०—यदि आत्मा एक ही है तो वह सर्वत्र सुखी-दुःखी होगा ।

सिद्धान्ती—सांख्यवादी की यह आपत्ति सम्भव नहीं है । सांख्य आत्मा का सुख-दुःखादिमत्त्व स्वीकार नहीं करता, क्योंकि सुख-दुःखादि तो बुद्धिसमवेत माने गये हैं तथा इसके सिवा अनुभव-स्वरूप आत्मा की भेदकल्पना में कोई प्रमाण भी नहीं है ।

यदि कहो कि भेद न होने पर तो प्रधान की परार्थता भी सम्भव नहीं है, तो ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योंकि प्रधान द्वारा सम्पादित कार्य का आत्मा के साथ सम्बन्ध नहीं है । यदि प्रधानकर्तृक बन्ध या मोक्ष पुरुषों में पृथक्-पृथक्-रूप से समवेत होते तो आत्मा का एकत्व मानने में प्रधान की परार्थता सम्भव नहीं हो सकती थी और तब पुरुषों के भेद की कल्पना करनी ठीक थी । किन्तु सांख्यवादी तो बन्ध या मोक्ष को पुरुष से सम्बद्ध ही नहीं मानते; वे तो आत्माओं को निर्विशेष और चेतनमात्र ही मानते हैं । अतः प्रधान की परार्थता तो केवल पुरुष की सत्तामात्र से ही सिद्ध है, पुरुषों के भेद के कारण नहीं । इसलिये पुरुषों की भेदकल्पना में प्रधान की परार्थता कारण नहीं है ।

इसके सिवा सांख्यवादियों के पास पुरुषों का भेद मानने में और कोई प्रमाण नहीं है । पर (आत्मा)-की सत्तामात्र को ही निमित्त बनाकर प्रधान स्वयं बन्ध और मोक्ष को प्राप्त होता है और वह पर केवल उपलब्धिमात्र सत्तास्वरूप से ही प्रधान की प्रवृत्ति में हेतु है, किसी विशेषता के कारण नहीं । अतः केवल मूढ़ता से ही पुरुषों की भेदकल्पना और वेदार्थ का परित्याग किया जाता है ।

इसके सिवा वैशेषिकादि मतावलम्बी जो कहते हैं कि इच्छा आदि आत्मा के धर्म हैं, सो उनका यह कथन भी ठीक नहीं है, क्योंकि स्मृति के हेतुभूत संस्कारों का प्रदेशहीन (निरवयव) आत्मा से समवाय सम्बन्ध नहीं हो सकता । यदि आत्मा और मन के संयोग से स्मृति की उत्पत्ति मानी जाय तो स्मृति का कोई नियम ही सम्भव नहीं है अथवा एक साथ ही सम्पूर्ण स्मृतियों की उत्पत्ति का प्रसङ्ग उपस्थित हो जायगा ।

इसके सिवा स्पर्शादि से रहित भिन्नजातीय आत्माओं का मन आदि के साथ सम्बन्ध मानना ठीक भी नहीं है । तथा दूसरों के मत में द्रव्य से रूप आदि उसके गुण एवं कर्म, सामान्य, विशेष और समवाय भिन्न भी नहीं हैं यदि दूसरों के मत में वे इच्छा आदि द्रव्य से तथा आत्मा से अत्यन्त भिन्न ही हों तो ऐसा होनेपर तो द्रव्य के साथ उनका सम्बन्ध ही सिद्ध नहीं हो सकता ।

यदि कहो कि अयुतसिद्ध पदार्थों का समवाय-सम्बन्ध मानने में विरोध नहीं है, तो ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योंकि इच्छा आदि अनित्य धर्मों से नित्य आत्मा पूर्वसिद्ध होने के कारण उनका परस्पर अयुतसिद्धत्व सम्भव नहीं है । यदि इच्छा आदि आत्मा के साथ अयुतसिद्ध हों तो आत्मगत महत्त्व के समान उनकी भी नित्यता का प्रसङ्ग उपस्थित हो जायगा । और यह बात इष्ट नहीं है, क्योंकि इससे आत्मा के अनिर्मोक्ष का प्रसङ्ग आ जाता है ।

यदि समवाय द्रव्य से भिन्न है तो द्रव्य के साथ उसका कोई अन्य सम्बन्ध बतलाना चाहिये, जैसा कि द्रव्य और गुण का है । और यदि कोई कहे कि समवाय तो नित्यसम्बन्ध ही है, इसलिये उसके साथ कोई सम्बन्ध बतलाने की आवश्यकता नहीं है तो ऐसी अवस्था में समवाय-सम्बन्धवालों का नित्यसम्बन्ध होने के कारण उनकी पृथक्ता सम्भव नहीं है ।

और यदि द्रव्यादि को परस्पर अत्यन्त भिन्न माना जाय तो जिस प्रकार स्पर्शवान् और स्पर्शहीन द्रव्यों में परस्पर सम्बन्ध होना सम्भव नहीं है उसी प्रकार उसका सम्बन्ध ही नहीं हो सकता ।

यदि आत्मा को इच्छादि उत्पत्ति-विनाशशील गुणोंवाला माना जाय तो उसकी अनित्यता का प्रसंग उपस्थित हो जायगा तथा उसके देह और फलादि के समान सावयवत्व एवं देहादि के समान ही विक्रियावत्त्व—ये दो दोष भी अपरिहार्य ही होंगे । जिस प्रकार कि आकाश का अविद्याध्यारोपित घटादि उपाधियों के कारण ही धूलि, धूम और मल से युक्त होना है उसी प्रकार आत्मा का भी, अविद्या से आरोपित बुद्धि आदि उपाधि के कारण सुख-दुःखादि दोष से युक्त होने पर, व्यावहारिक बन्ध, मोक्ष आदि होने में कोई विरोध नहीं है; क्योंकि सभी वादियों ने व्यवहार को अविद्याकृत माना है, परमार्थरूप नहीं माना । अतः तार्किकलोग जीवों के भेद की कल्पना वृथा ही करते हैं ॥ ५ ॥

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यथैकस्मिन्घटाकाशे रजोधूमादिभिर्युते संयुक्ते न सर्वे घटाकाशादयस्तद्रजोधूमादिभिः संयुज्यन्ते तद्वज्जीवाः सुखादिभिः ।

नन्वेक एवात्मा?

बाढम्; ननु न श्रुतं त्वयाकाशवत्सर्वसंघातेष्वेक एवात्मेति?

यद्येक एवात्मा तर्हि सर्वत्र सुखी दुःखी च स्यात् ।

न चेदं सांख्यचोद्यं सम्भवति । आत्मैकत्वे न हि सांख्य आत्मनः सांख्याक्षेप- सुखदुःखादिमत्त्वनिवृत्तिः मिच्छति बुद्धिसमवायाभ्युपगमात्सुखदुःखादीनाम् । न चोपलब्धिस्वरूपस्यात्मनो भेदकल्पनायां प्रमाणमस्ति ।

भेदाभावे प्रधानस्य पारार्थ्यानुपपत्तिरिति चेत्, न; प्रधानकृतस्यार्थस्यात्मन्यसमवायात् । यदि हि प्रधानकृतो बन्धो मोक्षो वार्थः पुरुषेषु भेदेन समवैति ततः प्रधानस्य पारार्थ्यमात्मैकत्वे नोपपद्यत इति युक्ता पुरुषभेदकल्पना । न च सांख्यैर्बन्धो मोक्षो वार्थः पुरुषसमवेतोऽभ्युपगम्यते । निर्विशेषाश्च चेतनमात्रा आत्मानोऽभ्युपगम्यन्ते । अतः पुरुषसत्तामात्रप्रयुक्तमेव प्रधानस्य पारार्थ्यं सिद्धं न तु पुरुषभेदप्रयुक्तमिति । अतः पुरुषभेदकल्पनायां न प्रधानस्य पारार्थ्यं हेतुः ।

न चान्यत्पुरुषभेदकल्पनायां प्रमाणमस्ति सांख्यानाम् । परसत्तामात्रमेव चैतन्निमित्तीकृत्य स्वयं बध्यते मुच्यते च प्रधानम् । परश्चोपलब्धिमात्रसत्तास्वरूपेण प्रधानप्रवृत्तौ हेतुर्न केनचिद्विशेषेणेति केवलमूढतयैव पुरुषभेदकल्पना वेदार्थपरित्यागश्च ।

ये त्वाहुर्वैशेषिकादय इच्छादयः वैशेषिकमत- आत्मसमवायिन समीक्षा इति; तदप्यसत् ।

स्मृतिहेतूनां संस्काराणामप्रदेशवत्यात्मन्यसमवायात् । आत्ममनःसंयोगाच्च स्मृत्युत्पत्तेः स्मृतिनियमानुपपत्तिः । युगपद्वा सर्वस्मृत्युत्पत्तिप्रसङ्गः ।

न च भिन्नजातीयानां स्पर्शादिमन आदिभिः हीनानामात्मनां मन आत्मसंयोगा- आदिभिः सम्बन्धो नुपपत्तिः युक्तः । न च द्रव्याद्रूपादयो गुणाः कर्मसामान्यविशेषसमवाया वा भिन्नाः सन्ति परेषाम् । यदि ह्यत्यन्तभिन्ना एव द्रव्यात्स्युरिच्छादयश्चात्मनस्तथा च सति द्रव्येण तेषां सम्बन्धानुपपत्तिः ।

अयुतसिद्धानां समवायलक्षणः सम्बन्धो न विरुध्यत इति चेत्, न । इच्छादिभ्योऽनित्येभ्य आत्मनो नित्यस्य पूर्वसिद्धत्वान्नायुतसिद्धत्वोपपत्तिः । आत्मनायुतसिद्धत्वे चेच्छादीनामात्मगतमहत्त्ववन्नित्यत्वप्रसङ्गः । स चानिष्टः । आत्मनोऽनिर्मोक्षप्रसङ्गात् ।

समवायस्य च द्रव्यादन्यत्वे सति द्रव्येण सम्बन्धान्तरं वाच्यं यथा द्रव्यगुणयोः । समवायो नित्यसम्बन्ध एवेति न वाच्यमिति चेत्तथा च समवायसम्बन्धवतां नित्यसम्बन्धप्रसङ्गात्पृथक्त्वानुपपत्तिः ।

अत्यन्तपृथक्त्वे च द्रव्यादीनां स्पर्शवदस्पर्शद्रव्ययोरिव षष्ठ्यर्थानुपपत्तिः ।

इच्छाद्युपजनापायवद्गुणवत्त्वे आत्मनो चात्मनोऽनित्यत्वव्यावहारिक- प्रसङ्गः । देहफलादिबन्धमोक्षा- वत्सावयवत्वं विक्रियाद्युपपादनम् वत्त्वं च देहादिवदेवेति दोषावपरिहार्यौ । यथा त्वाकाशस्याविद्याध्यारोपितरजोधूममलवत्त्वादिदोषवत्त्वं तथात्मनोऽविद्याध्यारोपितबुद्ध्याद्युपाधिकृतसुखदुःखादिदोषवत्त्वं बन्धमोक्षादयो व्यावहारिका न विरुध्यन्ते । सर्ववादिभिरविद्याकृतव्यवहाराभ्युपगमात्परमार्थानभ्युपगमाच्च । तस्मादात्मभेदपरिकल्पना वृथैव तार्किकैः क्रियत इति ॥ ५ ॥


व्यावहारिक जीवभेद

किन्तु एक ही आत्मा में, आत्माओं के भेद के कारण होनेवाले के समान अविद्याकृत व्यवहार किस प्रकार सम्भव है? इस पर कहते हैं—
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कथं पुनरात्मभेदनिमित्त इव व्यवहार एकस्मिन्नात्मन्यविद्याकृत उपपद्यत इति, उच्यते—