अद्वैत प्रकरण - कारिका 6

रूपकार्यसमाख्याश्च भिद्यन्ते तत्र तत्र वै ।
आकाशस्य न भेदोऽस्ति तद्वज्जीवेषु निर्णयः ॥ ६ ॥

rūpakāryasamākhyāśca bhidyante tatra tatra vai .
ākāśasya na bhedo’sti tadvajjīveṣu nirṇayaḥ .. 6 ..


[घटादि उपाधियों के कारण प्रतीत होनेवाले] भिन्न-भिन्न आकाशों के रूप, कार्य और नामों में तो भेद है, परन्तु आकाश में तो कोई भेद नहीं है । उसी प्रकार जीवों के विषय में भी निश्चय समझना चाहिये ॥ ६ ॥
जिस प्रकार इस एक ही आकाश में घट, कमण्डलु और मठादि आकाशों के अल्पत्व-महत्त्वादि रूपों में भेद है, तथा जहाँ-तहाँ व्यवहार में उनके किये हुए जल लाना, जल धारण करना और शयन करना आदि कार्य एवं घटाकाश करकाकाश आदि नाम भिन्न-भिन्न देखे जाते हैं । किन्तु आकाश में रूपादि के कारण होनेवाला यह सब व्यवहार पारमार्थिक ही नहीं है । परमार्थतः तो आकाश का कोई भेद नहीं है । अन्य उपाधिकृत निमित्त के सिवा वस्तुतः आकाश के भेद के कारण होनेवाला कोई व्यवहार है ही नहीं । जैसा कि यह [आकाश का भेद] है उसी प्रकार देहादि उपाधि के भेद से किये हुए घटाकाशस्थानीय जीवों में भेद का निरूपण किया जाने के कारण बुद्धिमानों ने [उस भेद का अपारमार्थिकत्व] निश्चय किया है—यह इसका तात्पर्य है ॥ ६ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
यथेहाकाश एकस्मिन्घटकरकापवरकाद्याकाशानामल्पत्वमहत्त्वादिरूपाणि भिद्यन्ते तथा कार्यमुदकाहरणधारणशयनादिसमाख्याश्च घटाकाशकरकाकाश इत्याद्यास्तत्कृताश्च भिन्ना दृश्यन्ते । तत्र तत्र वै व्यवहारविषय इत्यर्थः । सर्वोऽयमाकाशे रूपादिभेदकृतो व्यवहारो न परमार्थ एव । परमार्थतस्त्वाकाशस्य न भेदोऽस्ति । न चाकाशभेदनिमित्तो व्यवहारोऽस्त्यन्तरेण परोपाधिकृतं द्वारम् । यथैतत्तद्देहोपाधिभेदकृतेषु जीवेषु घटाकाशस्थानीयेष्वात्मसु निरूपणात्कृतो बुद्धिमद्भिर्निर्णयो निश्चय इत्यर्थः ॥ ६ ॥

जीव आत्मा का विकार या अवयव नहीं है

किन्तु घटाकाशादि में जो रूप और कार्य आदि का भेद-व्यवहार है वह तो वास्तविक ही है? [ऐसी शंका होने पर कहते हैं—] यह बात नहीं है, क्योंकि—
संस्कृत भाष्य पढ़ें
ननु तत्र परमार्थकृत एव घटाकाशादिषु रूपकार्यादिभेदव्यवहार इति? नैतदस्ति, यस्मात्