नाकाशस्य घटाकाशो विकारावयवौ यथा ।
नैवात्मनः सदा जीवो विकारावयवौ तथा ॥ ७ ॥
नैवात्मनः सदा जीवो विकारावयवौ तथा ॥ ७ ॥
nākāśasya ghaṭākāśo vikārāvayavau yathā .
naivātmanaḥ sadā jīvo vikārāvayavau tathā .. 7 ..
जिस प्रकार घटाकाश आकाश का विकार या अवयव नहीं है उसी प्रकार जीव भी आत्मा का विकार या अवयव कभी नहीं है ॥ ७ ॥
परमार्थाकाश का घटाकाश न तो विकार है, जैसे कि सुवर्ण के रुचकादि आभूषण तथा जल के फेन, बुद्बुद और हिम आदि हैं, और न जैसे शाखादि वृक्ष के अवयव हैं उस प्रकार उसका अवयव ही है । इसी तरह, जैसे कि महाकाश का घटाकाश विकार या अवयव नहीं है उसी प्रकार अर्थात् उपर्युक्त दृष्टान्तानुसार ही, महाकाशस्थानीय परमार्थ सत् परमात्मा का घटाकाशस्थानीय जीव, किसी अवस्था में विकार या अवयव नहीं है । अतः तात्पर्य यह है कि आत्मभेदजनित व्यवहार मिथ्या ही है ॥ ७ ॥
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परमार्थाकाशस्य घटाकाशो न विकारः; यथा सुवर्णस्य रुचकादिर्यथा वापां फेनबुद्बुदहिमादिः; नाप्यवयवो यथा वृक्षस्य शाखादिः । न तथा आकाशस्य घटाकाशो विकारावयवौ यथा तथा नैवात्मनः परस्य परमार्थसतो महाकाशस्थानीयस्य घटाकाशस्थानीयो जीवः सदा सर्वदा यथोक्तदृष्टान्तवन्न विकारो नाप्यवयवः । अत आत्मभेदकृतो व्यवहारो मृषैवेत्यर्थः ॥ ७ ॥
आत्मा की मलिनता अज्ञानियों की दृष्टि में है
क्योंकि जिस प्रकार घटाकाशादि भेदबुद्धि के कारण उसका रूप एवं कार्य आदि भेदव्यवहार है उसी प्रकार देहोपाधिक जीवभेद के कारण ही जन्ममरण आदि व्यवहार है; इसलिये उसका किया हुआ ही आत्मा का क्लेश, कर्मफल और मल से युक्त होना है, परमार्थतः नहीं—इसी बात को दृष्टान्त से प्रतिपादन करने की इच्छा से कहते हैं—
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यस्माद्यथा घटाकाशादिभेदबुद्धिनिबन्धनो रूपकार्यादि- भेदव्यवहारस्तथा देहोपाधिजीवभेदकृतो जन्ममरणादिव्यवहारः । तस्मात्तत्कृतमेव क्लेशकर्मफलमलवत्त्वमात्मनो न परमार्थत इत्येतमर्थं दृष्टान्तेन प्रतिपिपादयिषन्नाह—