तथा भवत्यबुद्धानामात्मापि मलिनो मलैः ॥ ८ ॥
yathā bhavati bālānāṃ gaganaṃ malinaṃ malaiḥ .
tathā bhavatyabuddhānāmātmāpi malino malaiḥ .. 8 ..
लोक में जिस प्रकार बाल अर्थात् अविवेकी पुरुषों की दृष्टि में आकाश मेघ, धूलि और धुआँ आदि मलों के कारण मलिन—मलयुक्त हो जाता है, किन्तु आकाश के यथार्थ स्वरूप को जाननेवालों की दृष्टि में ऐसा नहीं होता; उसी प्रकार अबुद्ध-प्रत्यगात्मा के विवेक से रहित पुरुषों की दृष्टि में, जो प्रत्यक् और सबका साक्षी है वह परात्मा भी क्लेश, कर्म और फलरूप मलों से मलिन हो जाता है; किन्तु आत्मज्ञानियों की दृष्टि में ऐसा नहीं होता ।
तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार ऊसरदेश तृषित प्राणी के आरोपित किये हुए जल के फेन और तरङ्गादि से युक्त नहीं होता उसी प्रकार आत्मा भी अज्ञानियों द्वारा आरोपित क्लेशादि मलों से मलिन नहीं होता ॥ ८ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
यथा भवति लोके बालानामविवेकिनां गगनमाकाशं घनरजोधूमादिमलैर्मलिनं मलवन्न गगनं मलवद्याथात्म्यविवेकिनाम्, तथा भवत्यात्मा परोऽपि यो विज्ञाता प्रत्यक्क्लेशकर्मफलमलैर्मलिनोऽबुद्धानां प्रत्यगात्मविवेकरहितानां नात्मविवेकवताम् ।
नह्यूषरदेशस्तृड्वत्प्राण्यध्यारोपितोदकफेनतरङ्गादिमांस्तथा नात्मा- बुधारोपितक्लेशादिमलैर्मलिनो भवतीत्यर्थः ॥ ८ ॥