अद्वैत प्रकरण - कारिका 9

मरणे सम्भवे चैव गत्यागमनयोरपि ।
स्थितौ सर्वशरीरेषु आकाशेनाविलक्षणः ॥ ९ ॥

maraṇe sambhave caiva gatyāgamanayorapi .
sthitau sarvaśarīreṣu ākāśenāvilakṣaṇaḥ .. 9 ..


यह आत्मा सम्पूर्ण शरीरों में मृत्यु, जन्म, लोकान्तर में गमनागमन और स्थित रहने में भी आकाश से अविलक्षण है । [अर्थात् इन सब व्यवहारों में रहते हुए भी यह आकाश के समान निर्विकार और विभु है] ॥ ९ ॥
घटाकाश के जन्म, नाश, गमन, आगमन और स्थिति के समान सम्पूर्ण शरीरों में आत्मा के जन्म-मरणादि को आकाश से अविलक्षण (भेदरहित) ही अनुभव करना चाहिये—यह इसका अभिप्राय है ॥ ९ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
घटाकाशजन्मनाशगमनागमनस्थितिवत्सर्वशरीरेष्वात्मनो जन्ममरणादिराकाशेनाविलक्षणः प्रत्येतव्य इत्यर्थः ॥ ९ ॥