ज्ञेयाभिन्नेन संबुद्धस्तं वन्दे द्विपदां वरम् ॥ १ ॥
jñānenākāśakalpena dharmānyo gaganopamān .
jñeyābhinnena saṃbuddhastaṃ vande dvipadāṃ varam .. 1 ..
जो आकाश की अपेक्षा कुछ असम्पूर्ण हो उसे आकाशकल्प अर्थात् आकाशतुल्य कहते हैं । उस आकाशसदृश ज्ञान से—किसे? आत्मा के धर्मों को । किस प्रकार के धर्मों को? गगनोपम धर्मों को—गगन (आकाश) जिनकी उपमा हो उन्हें गगनोपम कहते हैं—ऐसे आत्मा के धर्मों को । ज्ञान का ही फिर विशेषण देते हैं—
अग्नि से उष्णता और सूर्य से प्रकाश के समान जो ज्ञान ज्ञेय धर्मों अर्थात् आत्माओं से अभिन्न है उस ज्ञेयाभिन्न अर्थात् ज्ञेय आत्मा के स्वरूप से अव्यतिरिक्त आकाशसदृश ज्ञान से जिसने आकाशोपम धर्मों को सदा ही सम्यक् प्रकार जाना है—ऐसा जो नारायणसंज्ञक ईश्वर है उस द्विपदांवर—दो पदों से उपलक्षित पुरुषों में श्रेष्ठ यानी प्रधान पुरुषोत्तम की वन्दना—अभिवादन करता हूँ ।
उपदेष्टा को नमस्कार करने से यह प्रतिज्ञा की जाती है कि इस प्रकरण में विरुद्ध पक्ष के प्रतिषेधद्वारा ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञाता के भेद से रहित परमार्थदर्शन का प्रतिपादन करना अभीष्ट है ॥ १ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
आकाशेनेषदसममाकाशकल्प-माकाशतुल्यमेतत् । तेनाकाशकल्पेन ज्ञानेन, किम्? धर्मान् आत्मनः, किं विशिष्टान् गगनोपमान् गगनमुपमा येषां ते गगनोपमास्तान् आत्मनो धर्मान् । ज्ञानस्यैव पुनर्विशेषणम्—
ज्ञेयैर्धर्मैरात्मभिरभिन्नमग्न्युष्णावत्सवितृप्रकाशवच्च ज्ञानं तेन ज्ञेयाभिन्नेन ज्ञानेनाकाशकल्पेन ज्ञेयात्मस्वरूपाव्यतिरिक्तेन गगनोपमान्धर्मान्यः संबुद्धः संबुद्धवानिति, अयमेवेश्वरो यो नारायणाख्यस्तं वन्देऽभिवादये द्विपदां वरं द्विपदोपलक्षितानां पुरुषाणां वरं प्रधानं पुरुषोत्तममित्यभिप्रायः ।
उपदेष्टृनमस्कारमुखेन ज्ञानज्ञेयज्ञातृभेदरहितं परमार्थतत्त्वदर्शनमिह प्रकरणे प्रतिपिपादयिषितं प्रतिपक्षप्रतिषेधद्वारेण प्रतिज्ञातं भवति ॥ १ ॥