अलातशान्ति प्रकरण - कारिका 10

जरामरणनिर्मुक्ताः सर्वे धर्माः स्वभावतः ।
जरामरणमिच्छन्तश्च्यवन्ते तन्मनीषया ॥ १० ॥

jarāmaraṇanirmuktāḥ sarve dharmāḥ svabhāvataḥ .
jarāmaraṇamicchantaścyavante tanmanīṣayā .. 10 ..


समस्त जीव स्वभाव से ही जरा-मरण से रहित हैं । उनके जरा-मरण स्वीकार करनेवाले लोग, इस विचार के कारण ही स्वभाव से च्युत हो जाते हैं ॥ १० ॥
‘जरामरणनिर्मुक्ताः’ अर्थात् जरामरणादि सम्पूर्ण विकारों से रहित हैं । कौन? सम्पूर्ण धर्म अर्थात् समस्त जीवात्मा, स्वभावतः यानी प्रकृति से ही । ऐसे स्वभाववाले होनेपर भी जरामरण के इच्छुक के समान इच्छा करनेवाले अर्थात् रज्जु में सर्प की भाँति आत्मा में जरा-मरण की कल्पना करनेवाले जीव, उसकी मनीषा—जरामरण की चिन्ता से अर्थात् उस भाव से भावित होने के दोषवश अपने स्वभाव से च्युत—विचलित हो जाते हैं ॥ १० ॥
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जरामरणनिर्मुक्ताः—जरामरणादिसर्वविक्रियावर्जिता इत्यर्थः । के? सर्वे धर्माः सर्व आत्मान इत्येतत्स्वभावतः प्रकृतितः । एवं स्वभावाः सन्तो धर्मा जरामरणमिच्छन्त इच्छन्त इवेच्छन्तो रज्ज्वामिव सर्पमात्मनि कल्पयन्तश्च्यवन्ते स्वभावतश्चलन्तीत्यर्थः, तन्मनीषया जन्ममरणचिन्तया तद्भावभावितत्वदोषेणेत्यर्थः ॥ १० ॥

सांख्यमत पर वैशेषिक की आपत्ति

सजातिवादी सांख्यमतावलम्बियों का कथन किस प्रकार असङ्गत है? सो वैशेषिकमतावलम्बी बतलाते हैं—
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कथं सजातिवादिभिः सांख्यैरनुपपन्नमुच्यत इत्याह वैशेषिकः—