अजमपि जनियोगं प्रापदैश्वर्ययोगादगति च गतिमत्तां प्रापदेकं ह्यनेकम् ।
विविधविषयधर्मग्राहिमुग्धेक्षणानां प्रणतभयविहन्तृ ब्रह्म यत्तन्नतोऽस्मि ॥ १ ॥
विविधविषयधर्मग्राहिमुग्धेक्षणानां प्रणतभयविहन्तृ ब्रह्म यत्तन्नतोऽस्मि ॥ १ ॥
ajamapi janiyogaṃ prāpadaiśvaryayogādagati ca gatimattāṃ prāpadekaṃ hyanekam .
vividhaviṣayadharmagrāhimugdhekṣaṇānāṃ praṇatabhayavihantṛ brahma yattannato’smi .. 1 ..
जिसने अजन्मा होकर भी अपनी ईश्वरीय शक्ति के योग से जन्म ग्रहण किया, गतिशून्य होने पर भी गति स्वीकार की तथा जो नाना प्रकार के विषयरूप धर्मों को ग्रहण करनेवाले मूढदृष्टि लोगों के विचार से एक होकर भी अनेक हुआ है और जो शरणागतभयहारी है उस ब्रह्म को मैं नमस्कार करता हूँ ॥ १ ॥