अलातशान्ति प्रकरण - वन्दना 2

प्रज्ञावैशाखवेधक्षुभितजलनिधेर्वेदनाम्नोऽन्तरस्थं भूतान्यालोक्य मग्नान्यविरतजननग्राहघोरे समुद्रे ।
कारुण्यादुद्धधारामृतमिदममरैर्दुर्लभं भूतहेतोर्यस्तं पूज्याभिपूज्यं परमगुरुममुं पादपातैर्नतोऽस्मि ॥ २ ॥

prajñāvaiśākhavedhakṣubhitajalanidhervedanāmno’ntarasthaṃ bhūtānyālokya magnānyaviratajananagrāhaghore samudre .
kāruṇyāduddhadhārāmṛtamidamamarairdurlabhaṃ bhūtahetoryastaṃ pūjyābhipūjyaṃ paramagurumamuṃ pādapātairnato’smi .. 2 ..


जो निरन्तर जन्म-जन्मान्तररूप ग्राहों के कारण अत्यन्त भयानक है, ऐसे संसारसागर में जीवों को डूबे हुए देखकर जिन्होंने करुणावश अपनी विशुद्ध बुद्धिरूप मन्थनदण्ड के आघात से क्षुभित हुए वेद नामक महासमुद्र के भीतर स्थित इस देवदुर्लभ अमृत को प्राणियों के कल्याण के लिये निकाला है, उन पूजनीयों के भी पूजनीय परम गुरु (श्रीगौडपादाचार्य)-को मैं उनके चरणों में गिरकर प्रणाम करता हूँ ॥ २ ॥