अलातशान्ति प्रकरण - कारिका 11

कारणं यस्य वै कार्यं कारणं तस्य जायते ।
जायमानं कथमजं भिन्नं नित्यं कथं च तत् ॥ ११ ॥

kāraṇaṃ yasya vai kāryaṃ kāraṇaṃ tasya jāyate .
jāyamānaṃ kathamajaṃ bhinnaṃ nityaṃ kathaṃ ca tat .. 11 ..


जिस (सांख्यमतावलम्बी)-के मत में कारण ही कार्य है उसके सिद्धान्तानुसार कारण ही उत्पन्न होता है । किन्तु जब कि वह जन्म लेनेवाला है तो अजन्मा कैसे हो सकता है और भिन्न (विदीर्ण) होने पर भी नित्य कैसे हो सकता है? ॥ ११ ॥

जिस वादी के मत में मृत्तिका के समान उपादान कारण ही कार्य है अर्थात् जिसके मत में कारण ही कार्यरूप में परिणत होता है उसके सिद्धान्तानुसार प्रधानादि कारण अजन्मा होता हुआ भी महदादि कार्यरूप से उत्पन्न होता है— ऐसा इसका तात्पर्य है । किन्तु यदि प्रधान महदादिरूप से उत्पन्न होनेवाला है तो वे उसे अजन्मा कैसे बतलाते हैं? उत्पन्न होता है और अजन्मा भी है— ऐसा कथन तो परस्पर विरुद्ध है ।

इसके सिवा वे प्रधान को नित्य भी बतलाते हैं । किन्तु वह भिन्न-विदीर्ण अर्थात् एक देश में स्फुटित यानी विकृत होनेवाला[ * ] होकर भी नित्य कैसे हो सकता है? तात्पर्य यह कि घटादि सावयव पदार्थ, जो एक देश में स्फुटित होनेवाले हैं, लोक में कभी नित्य नहीं देखे गये । वह अपने एक देश में विदीर्ण होता है तथा अज और नित्य भी है— यह तो उनका विरुद्ध कथन ही है— ऐसा इसका अभिप्राय है ॥ ११ ॥

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कारणं मृद्वदुपादानलक्षणं यस्य वादिनो वै कार्यं कारणमेव कार्याकारेण परिणमते यस्य वादिन इत्यर्थः, तस्याजमेव सत्प्रधानादि कारणं महदादिकार्यरूपेण जायत इत्यर्थः । महदाद्याकारेण चेज्जायमानं प्रधानं कथमजमुच्यते तैर्विप्रतिषिद्धं चेदं जायतेऽजं चेति ।

नित्यं च तैरुच्यते प्रधानं भिन्नं विदीर्णं स्फुटितमेकदेशेन सत्कथं नित्यं भवेदित्यर्थः । न हि सावयवं घटादि एकदेशस्फुटनधर्मि नित्यं दृष्टं लोक इत्यर्थः । विदीर्णं च स्यादेकदेशेनाजं नित्यं चेति एतद्विप्रतिषिद्धं तैरभिधीयत इत्यभिप्रायः ॥ ११ ॥


उपर्युक्त अभिप्राय का ही स्पष्टीकरण करने के लिये कहते हैं—

[ * ]: जैसे बीज अंकुररूप से फूटता है ।

संस्कृत भाष्य पढ़ें
उक्तस्यैवार्थस्य स्पष्टीकरणार्थमाह—