कारणाद्यद्यनन्यत्वमतः कार्यमजं यदि ।
जायमानाद्धि वै कार्यात्कारणं ते कथं ध्रुवम् ॥ १२ ॥
जायमानाद्धि वै कार्यात्कारणं ते कथं ध्रुवम् ॥ १२ ॥
kāraṇādyadyananyatvamataḥ kāryamajaṃ yadi .
jāyamānāddhi vai kāryātkāraṇaṃ te kathaṃ dhruvam .. 12 ..
यदि कारण से कार्य की अभिन्नता है तब तो तुम्हारे मत में कार्य भी अजन्मा है; और यदि ऐसी बात है तो उत्पन्न होनेवाले कार्य से अभिन्न होने पर कारण भी किस प्रकार निश्चल रह सकता है? ॥ १२ ॥
यदि तुम्हें अजन्मा कारण से कार्य की अनन्यता इष्ट है तो [तुम्हारे मत में]—यह बात सिद्ध होती है कि कार्य भी अजन्मा है । किन्तु कार्य है और अजन्मा है यह तुम्हारे कथन में एक दूसरा विरोध है । इसके सिवा, कार्य और कारण की अनन्यता होने पर उत्पत्तिशील कार्य से अभिन्न उसका कारण नित्य और निश्चल कैसे रह सकता है? ऐसा कभी नहीं हो सकता कि मुर्गी का एक अंश तो पकाया जाय और दूसरा सन्तानोत्पत्ति के योग्य बनाये रखा जाय ॥ १२ ॥
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कारणादजात्कार्यस्य यद्यनन्यत्वमिष्टं त्वया ततः कार्यकारणयोरभिन्नत्वे कार्यमजमिति प्राप्तम् । विप्रतिपत्तिः इदं चान्यद्विप्रतिषिद्धं कार्यमजं चेति तव । किं चान्यत्कार्यकारणयोरनन्यत्वे जायमानाद्धि वै कार्यात्कारणमनन्यन्नित्यं ध्रुवं च ते कथं भवेत् । न हि कुक्कुट्या एकदेशः पच्यत एकदेशः प्रसवाय कल्प्यते ॥ १२ ॥
इसके सिवा और भी—
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किं चान्यत्—