अलातशान्ति प्रकरण - कारिका 13

अजाद्वै जायते यस्य दृष्टान्तस्तस्य नास्ति वै ।
जाताच्च जायमानस्य न व्यवस्था प्रसज्यते ॥ १३ ॥

ajādvai jāyate yasya dṛṣṭāntastasya nāsti vai .
jātācca jāyamānasya na vyavasthā prasajyate .. 13 ..


जिसके मत में अजन्मा वस्तु से ही किसी कार्य की उत्पत्ति होती है उसके पास निश्चय ही इसका कोई दृष्टान्त नहीं है । और यदि जात पदार्थ से ही कार्य की उत्पत्ति मानी जाय तो अनवस्था उपस्थित हो जाती है ॥ १३ ॥
जिस वादी के मत में अज—अनुत्पन्न वस्तु से कार्य की उत्पत्ति होती है उसके पास निश्चय ही कोई दृष्टान्त नहीं है । अतः तात्पर्य यह हुआ कि दृष्टान्त का अभाव होने के कारण यह बात स्वयं सिद्ध हो जाती है कि अज वस्तु से किसी की उत्पत्ति नहीं होती । और जब किसी जात—उत्पन्न होनेवाली वस्तु से कार्यवर्ग की उत्पत्ति मानी जाती है तो वह भी किसी अन्य जात वस्तु से उत्पन्न होनी चाहिये और वह किसी और ही से उत्पन्न होनी चाहिये—इस प्रकार कोई व्यवस्था ही नहीं रहती; अर्थात् अनवस्था उपस्थित हो जाती है ॥ १३ ॥
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अजादनुत्पन्नाद्वस्तुनो जायते जाताजातयो- यस्य वादिनः कार्यं रुभयोरपि दृष्टान्तस्तस्य नास्ति कारणत्वानुपपत्तिः वै, दृष्टान्ताभावेऽर्थादजान्न किञ्चिज्जायत इति सिद्धं भवतीत्यर्थः । यदा पुनर्जाताज्जायमानस्य वस्तुनोऽभ्युपगमः, तदप्यन्यस्माद् जातात्तदप्यन्यस्मादिति न व्यवस्था प्रसज्यते । अनवस्थानं स्यादित्यर्थः ॥ १३ ॥

हेतु और फल के अन्योन्यकारणत्व में दोष

“जिस अवस्था में इसकी दृष्टि में सब आत्मा ही हो गया है” इस श्रुति ने जो परमार्थतः द्वैत का अभाव बतलाया है, उसीको आश्रित करके कहते हैं—
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“यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्” (बृ० उ० २ । ४ । १४) इति परमार्थतो द्वैताभावः श्रुत्योक्तस्तमाश्रित्याह—