अलातशान्ति प्रकरण - कारिका 14

हेतोरादिः फलं येषामादिर्हेतुः फलस्य च ।
हेतोः फलस्य चानादिः कथं तैरुपवर्ण्यते ॥ १४ ॥

hetorādiḥ phalaṃ yeṣāmādirhetuḥ phalasya ca .
hetoḥ phalasya cānādiḥ kathaṃ tairupavarṇyate .. 14 ..


जिनके मत में हेतु का कारण फल है और फल का कारण हेतु है वे हेतु और फल के अनादित्व का प्रतिपादन कैसे करते हैं? ॥ १४ ॥
जिन वादियों के मत में हेतु अर्थात् धर्मादि का आदिकारण देहादि संघातरूप फल है तथा देहादि संघातरूप फल का आदिकारण धर्माधर्मादि हेतु है[ * ] —इस प्रकार हेतु और फल का एक-दूसरे के कार्य-कारणरूप से सकारणत्व बतलानेवाले उन लोगों द्वारा हेतु और फल का अनादित्व किस प्रकार प्रतिपादन किया जाता है? अर्थात् उनका यह कथन सर्वथा विरुद्ध है । नित्य कूटस्थ आत्मा की हेतुफलात्मकता तो किसी प्रकार भी सम्भव नहीं है ॥ १४ ॥
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हेतोर्धर्मादेरादिः कारणं देहादिसंघातः फलं येषां वादिनाम् । तथादिः कारणं हेतुर्धर्माधर्मादिः फलस्य च देहादिसंघातस्य । एवं हेतुफलयोरितरेतरकार्यकारणत्वेनादिमत्त्वं ब्रुवद्भिरेवं हेतोः फलस्य चानादित्वं कथं तैरुपवर्ण्यते? विप्रतिषिद्धमित्यर्थः । न हि नित्यस्य कूटस्थस्यात्मनो हेतुफलात्मता संभवति ॥ १४ ॥

वे किस प्रकार विरुद्ध मत को मानते हैं, सो बतलाया जाता है—
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कथं तैर्विरुद्धमभ्युपगम्यत इत्युच्यते—