हेतोरादिः फलं येषामादिर्हेतुः फलस्य च ।
तथा जन्म भवेत्तेषां पुत्राज्जन्म पितुर्यथा ॥ १५ ॥
तथा जन्म भवेत्तेषां पुत्राज्जन्म पितुर्यथा ॥ १५ ॥
hetorādiḥ phalaṃ yeṣāmādirhetuḥ phalasya ca .
tathā janma bhavetteṣāṃ putrājjanma pituryathā .. 15 ..
जिनके मत में हेतु का कारण फल है और फल का कारण हेतु है उनकी [मानी हुई] उत्पत्ति ऐसी ही है जैसे पुत्र से पिता का जन्म होना ॥ १५ ॥
हेतु से उत्पन्न होनेवाले फल से ही हेतु का जन्म माननेवाले उन लोगों के मत में ऐसा ही विरोध कहा जाता है जैसे पुत्र से पिता का जन्म बतलाने में ॥ १५ ॥
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हेतुजन्यादेव फलाद्धेतोर्जन्माभ्युपगच्छतां तेषामीदृशो विरोध उक्तो भवति यथा पुत्राज्जन्म पितुः ॥ १५ ॥
यदि तुम ऐसा मानते हो कि उपर्युक्त विरोध मानना उचित नहीं है तो—
[ * ]: अर्थात् जो धर्मादि को शरीरादि की प्राप्ति का कारण और शरीर को धर्मादि-सम्पादन का कारण मानते हैं ।
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यथोक्तो विरोधो न युक्तोऽभ्युपगन्तुमिति चेन्मन्यसे—