फलादुत्पद्यमानः सन्न ते हेतुः प्रसिध्यति ।
अप्रसिद्धः कथं हेतुः फलमुत्पादयिष्यति ॥ १७ ॥
अप्रसिद्धः कथं हेतुः फलमुत्पादयिष्यति ॥ १७ ॥
phalādutpadyamānaḥ sanna te hetuḥ prasidhyati .
aprasiddhaḥ kathaṃ hetuḥ phalamutpādayiṣyati .. 17 ..
तुम्हारे मत में यदि हेतु फल से उत्पन्न होता है तो वह [हेतुरूप से] सिद्ध ही नहीं हो सकता; और असिद्ध हेतु फल को उत्पन्न कैसे करेगा? ॥ १७ ॥
जन्य अर्थात् जो स्वतः प्राप्त नहीं है उस शशशृङ्ग के समान असत् फल से उत्पन्न होनेवाला होनेपर तो हेतु ही सिद्ध नहीं होता अर्थात् उसीका जन्म नहीं हो सकता । इस प्रकार शशशृङ्ग के समान जिसकी स्वतः उपलब्धि नहीं है वह अप्रसिद्ध हेतु तुम्हारे मत में किस प्रकार फल उत्पन्न कर देगा? एक-दूसरे की अपेक्षा से सिद्ध होनेवाले तथा शशशृङ्ग के समान सर्वथा असत् पदार्थों का कार्यकारणभाव से अथवा किसी और प्रकार कभी सम्बन्ध नहीं देखा गया—यह इसका अभिप्राय है ॥ १७ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
जन्यात्स्वतोऽलब्धात्मकात् फलादुत्पद्यमानः सन्न शशविषाणादेरिवासतो न हेतुः प्रसिध्यति जन्म न लभते ।
अलब्धात्मकोऽप्रसिद्धः सञ्शशविषाणादिकल्पस्तव कथं फलमुत्पादयिष्यति? न हीतेतरापेक्षसिद्धयोः शशविषाणकल्पयोः कार्यकारणभावेन सम्बन्धः क्वचिद् दृष्टः, अन्यथा वेत्यभिप्रायः ॥ १७ ॥