अलातशान्ति प्रकरण - कारिका 18

यदि हेतोः फलात्सिद्धिः फलसिद्धिश्च हेतुतः ।
कतरत्पूर्वनिष्पन्नं यस्य सिद्धिरपेक्षया ॥ १८ ॥

yadi hetoḥ phalātsiddhiḥ phalasiddhiśca hetutaḥ .
kataratpūrvaniṣpannaṃ yasya siddhirapekṣayā .. 18 ..


[तुम्हारे मत में] यदि फल से हेतु की सिद्धि होती है और हेतु से फल की सिद्धि होती है तो उनमें पहले कौन हुआ? जिसकी अपेक्षा से कि दूसरे का आविर्भाव माना जाय? ॥ १८ ॥
हेतु और फल के कार्य-कारणभाव का असम्बन्धतादोष से निराकरण कर दिया जानेपर भी यदि तुम हेतु और फल की एक-दूसरे से सिद्धि मानते ही हो तो इन हेतु और फल में से पहले कौन हुआ—सो बतलाओ; जिसकी पूर्वसिद्धि की अपेक्षा से पीछे होनेवाले की सिद्धि मानी जाय? —यह इसका तात्पर्य है ॥ १८ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
असम्बन्धतादोषेणापोदितेऽपि हेतुफलयोः कार्यकारणभावे यदि हेतुफलयोरन्योन्यसिद्धिरभ्युपगम्यत एव त्वया कतरत्पूर्वनिष्पन्नं हेतुफलयोर्यस्य पश्चाद्भाविनः सिद्धिः स्यात्पूर्वसिद्ध्यपेक्षया तद्ब्रूहीत्यर्थः ॥ १८ ॥

और यदि तुम ऐसा मानते हो कि यह नहीं बतलाया जा सकता तो—
संस्कृत भाष्य पढ़ें
अथैतन्न शक्यते वक्तुमिति मन्यसे, सेयमशक्तिरपरिज्ञानं तत्त्वाविवेको मूढतेत्यर्थः । अथवा योऽयं त्वयोक्तः क्रमो हेतोः फलस्य सिद्धिः फलाच्च हेतोः सिद्धिरितीतरेतरानन्तर्यलक्षणस्तस्य कोपो विपर्यासोऽन्यथाभावः स्यादित्यभिप्रायः । एवं हेतुफलयोः कार्यकारणभावानुपपत्तेरजातिः सर्वस्यानुत्पत्तिः परिदीपिता प्रकाशितान्योन्यपक्षदोषं ब्रुवद्भिर्वादिभिर्बुद्धैः पण्डितैरित्यर्थः ॥ १९ ॥