अलातशान्ति प्रकरण - कारिका 19

अशक्तिरपरिज्ञानं क्रमकोपोऽथ वा पुनः ।
एवं हि सर्वथा बुद्धैरजातिः परिदीपिता ॥ १९ ॥

aśaktiraparijñānaṃ kramakopo’tha vā punaḥ .
evaṃ hi sarvathā buddhairajātiḥ paridīpitā .. 19 ..


यह अशक्ति (असामर्थ्य) अज्ञान है अथवा फिर तो इससे उपर्युक्त क्रम का भी विपर्यय हो जाता है [क्योंकि इनके पूर्वापरत्व का ज्ञान न होने से इनमें जो पूर्ववर्ती है वह कारण है और पीछे होनेवाला कार्य है ऐसा कोई नियम भी नहीं रह सकता] । इस प्रकार उन बुद्धिमानों ने सर्वथा अजाति को ही प्रकाशित किया है ॥ १९ ॥
यह अशक्ति [तुम्हारा] अपरिज्ञान— तत्त्व का अविवेक अर्थात् मूढ़ता ही है । अथवा तुमने जो एक-दूसरे का पौर्वापर्यरूप यह क्रम बतलाया है कि हेतु से फल की सिद्धि होती है और फल से हेतु की, उसका कोप—विपर्यास अर्थात् अन्यथाभाव हो जायगा—ऐसा इसका अभिप्राय है । इस प्रकार हेतु और फल का कार्य-कारणभाव असम्भव होने के कारण एक-दूसरे के पक्ष का दोष बतलानेवाले प्रतिपक्षी बुद्धिमानों अर्थात् पण्डितों ने सबकी अजाति—अनुत्पत्ति ही प्रकाशित की है ॥ १९ ॥

पूर्व०—हमने जो कहा कि हेतु और फल का परस्पर कार्य-कारणभाव है, सो तुमने हमारे शब्दमात्र को पकड़कर छलपूर्वक ऐसा कह दिया कि ‘जैसे पुत्र से पिता का जन्म होना है’ ‘[दायें बायें] सींगों के समान [उनका परस्पर] सम्बन्ध ही नहीं हो सकता’ इत्यादि । हमने असिद्ध हेतु से फल की सिद्धि अथवा असिद्ध फल से हेतु की सिद्धि कभी नहीं मानी तो फिर क्या माना है? हम तो बीज और अङ्कुर के समान केवल उनका कार्य-कारणभाव मानते हैं ।

सिद्धान्ती—इसपर हमें यह कहना है कि—

संस्कृत भाष्य पढ़ें

ननु हेतुफलयोः कार्यकारणभाव इत्यस्माभिरुक्तं शब्दमात्रमाश्रित्यच्छलमिदं त्वयोक्तं पुत्राज्जन्म पितुर्यथा, विषाणवच्चासम्बन्ध इत्यादि । न ह्यस्माभिरसिद्धाद्धेतोः फलसिद्धिरसिद्धाद्वा फलाद्धेतुसिद्धिरभ्युपगता । किं तर्हि? बीजाङ्कुरवत्कार्यकारणभावोऽभ्युपगम्यत इति ।

अत्रोच्यते—