एवं हि सर्वथा बुद्धैरजातिः परिदीपिता ॥ १९ ॥
aśaktiraparijñānaṃ kramakopo’tha vā punaḥ .
evaṃ hi sarvathā buddhairajātiḥ paridīpitā .. 19 ..
पूर्व०—हमने जो कहा कि हेतु और फल का परस्पर कार्य-कारणभाव है, सो तुमने हमारे शब्दमात्र को पकड़कर छलपूर्वक ऐसा कह दिया कि ‘जैसे पुत्र से पिता का जन्म होना है’ ‘[दायें बायें] सींगों के समान [उनका परस्पर] सम्बन्ध ही नहीं हो सकता’ इत्यादि । हमने असिद्ध हेतु से फल की सिद्धि अथवा असिद्ध फल से हेतु की सिद्धि कभी नहीं मानी तो फिर क्या माना है? हम तो बीज और अङ्कुर के समान केवल उनका कार्य-कारणभाव मानते हैं ।
सिद्धान्ती—इसपर हमें यह कहना है कि—
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ननु हेतुफलयोः कार्यकारणभाव इत्यस्माभिरुक्तं शब्दमात्रमाश्रित्यच्छलमिदं त्वयोक्तं पुत्राज्जन्म पितुर्यथा, विषाणवच्चासम्बन्ध इत्यादि । न ह्यस्माभिरसिद्धाद्धेतोः फलसिद्धिरसिद्धाद्वा फलाद्धेतुसिद्धिरभ्युपगता । किं तर्हि? बीजाङ्कुरवत्कार्यकारणभावोऽभ्युपगम्यत इति ।
अत्रोच्यते—