अविवादोऽविरुद्धश्च देशितस्तं नमाम्यहम् ॥ २ ॥
asparśayogo vai nāma sarvasattvasukho hitaḥ .
avivādo’viruddhaśca deśitastaṃ namāmyaham .. 2 ..
जिस योग का किसी से कभी स्पर्श यानी सम्बन्ध नहीं है, उसे ‘अस्पर्शयोग’ कहते हैं; वह ब्रह्मस्वभाव ही है । ‘वै’ ‘नाम’ इन पदों का यह तात्पर्य है कि वह ‘ब्रह्मवेत्ताओं का अस्पर्शयोग’ इस नाम से प्रसिद्ध है और वह समस्त प्राणियों के लिये सुखकर होता है । कोई विषय तो अत्यन्त सुखसाधनविशिष्ट होने पर भी दुःखरूप होता है, जैसा कि तप । किन्तु यह ऐसा नहीं है । तो फिर कैसा है? यह सभी प्राणियों के लिये सुखदायक है ।
इसी प्रकार इस लोक में कोई-कोई विषयसामग्री सुखदायक तो होती है किन्तु हितकर नहीं होती । किन्तु यह तो सर्वदा अविचलस्वभाव होने के कारण सुखदायक भी है और हितकर भी । यही नहीं, यह अविवाद भी है । जिसमें पक्ष-प्रतिपक्ष स्वीकार करके विरुद्ध कथनरूप विवाद नहीं होता उसे अविवाद कहते हैं । ऐसा यह क्यों है? क्योंकि यह सबसे अविरुद्ध है । ऐसे जिस योग का शास्त्र ने उपदेश किया है, उसे मैं नमस्कार यानी प्रणाम करता हूँ ॥ २ ॥
[ * ]: यहाँ अद्वैतसम्प्रदाय के आदि आचार्य बदरिकाश्रमाधीश्वर तापसाग्रगण्य श्रीनारायण की वन्दना की गयी है ।
संस्कृत भाष्य पढ़ें
स्पर्शनं स्पर्शः सम्बन्धो न विद्यते यस्य योगस्य केनचित्कदाचिदपि सोऽस्पर्शयोगो ब्रह्मस्वभाव एव, वै नामेति ब्रह्मविदामस्पर्शयोग इत्येवंप्रसिद्ध इत्यर्थः । स च सर्वसत्त्वसुखः । भवति कश्चिदत्यन्तसुखसाधनविशिष्टोऽपि दुःखरूपः, यथा तपः । अयं तु न तथा । किं तर्हि सर्वसत्त्वानां सुखः ।
तथेह भवति कश्चिद्विषयोपभोगः सुखो न हितः । अयं तु सुखो हितश्च नित्यमप्रचलितस्वभावत्वात् । किं चाविवादो विरुद्धवदनं विवादः पक्षप्रतिपक्षपरिग्रहेण यस्मिन्न विद्यते सोऽविवादः । कस्मात्? यतोऽविरुद्धश्च । य ईदृशो योगो देशितः, उपदिष्टः शास्त्रेण तं नमाम्यहं प्रणमामीत्यर्थः ॥ २ ॥