न हि साध्यसमो हेतुः सिद्धौ साध्यस्य युज्यते ॥ २० ॥
bījāṅkurākhyo dṛṣṭāntaḥ sadā sādhyasamo hi saḥ .
na hi sādhyasamo hetuḥ siddhau sādhyasya yujyate .. 20 ..
बीजाङ्कुर नाम का जो दृष्टान्त है वह तो साध्य के ही समान है—ऐसा मेरा अभिप्राय है । यदि कहो कि बीज और अङ्कुर का कार्य-कारणभाव तो प्रत्यक्ष ही अनादि है तो ऐसी बात नहीं है; क्योंकि उनमें से पूर्व-पूर्व [अङ्कुर और फल] को परवर्तियों के समान आदिमान् माना गया है । जिस प्रकार इस समय बीज से उत्पन्न हुआ दूसरा अङ्कुर आदिमान् है उसी प्रकार क्रमशः दूसरे अङ्कुर से उत्पन्न हुआ दूसरा बीज भी आदिमान् है । इस प्रकार पूर्व-पूर्व अङ्कुर और पूर्व-पूर्व बीज आदिमान् ही है ।
अतः सम्पूर्ण बीजाङ्कुरवर्ग का प्रत्येक बीज और अङ्कुर आदिमान् होने के कारण किसी का भी अनादि होना असम्भव है । यही न्याय हेतु और फल के विषय में भी समझना चाहिये ।
यदि कहो कि बीजाङ्कुरपरम्परा तो अनादि हो ही सकती है; तो ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योंकि उसका एकत्व नहीं माना गया । हेतु-फल का अनादित्व प्रतिपादन करनेवालों ने बीज और अङ्कुर से भिन्न बीजाङ्कुरपरम्परा अथवा हेतुफलपरम्परा नाम का कोई एक स्वतन्त्र पदार्थ नहीं माना । अतः ‘वे लोग हेतु और फल का अनादित्व किस प्रकार प्रतिपादन करते हैं’ यह कथन बहुत ठीक है । इसके सिवा अनुपपत्ति होने के कारण भी हमारा कथन छल नहीं है— ऐसा इसका तात्पर्य है । अभिप्राय यह है कि लोक में प्रमाणकुशल पुरुषों द्वारा साध्य की सिद्धि के लिये साध्य के ही सदृश हेतु का प्रयोग नहीं किया जाता । यहाँ ‘हेतु’ शब्द का अभिप्राय दृष्टान्त है, क्योंकि वह उसी का ज्ञापक है; यहाँ दृष्टान्त का ही प्रकरण भी है—हेतु का नहीं ॥ २० ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
बीजाङ्कुराख्यो दृष्टान्तो यः स साध्येन तुल्यो बीजाङ्कुरदृष्टान्तस्य ममेत्यभिप्रायः । साध्यसमत्वम् ननु प्रत्यक्षः कार्यकारणभावो बीजाङ्कुरयोरनादिः? न, पूर्वस्य पूर्वस्यापरवदादिमत्त्वाभ्युपगमात् । यथेदानीमुत्पन्नोऽपरोऽङ्कुरो बीजादादिमान्बीजं चापरमन्यस्मादङ्कुरादिति क्रमेणोत्पन्नत्वादादिमत् ।
एवं पूर्वः पूर्वोऽङ्कुरो बीजं च पूर्वं पूर्वमादिमदेवेति प्रत्येकं सर्वस्य बीजाङ्कुरजातस्यादिमत्त्वात्कस्यचिदप्यनादित्वानुपपत्तिः । एवं हेतुफलानाम् ।
अथ बीजाङ्कुरसन्ततेरनादिबीजाङ्कुर- मत्त्वमिति चेत्? न, सन्ततिनिरासः एकत्वानुपपत्तेः । न हि बीजाङ्कुरव्यतिरेकेण बीजाङ्कुरसन्ततिर्नामैकाभ्युपगम्यते हेतुफलसन्ततिर्वा तदनादित्ववादिभिः । तस्मात्सूक्तं हेतोः फलस्य चानादिः कथं तैरुपवर्ण्यत इति । तथा चान्यदप्यनुपपत्तेर्नच्छलमित्यभिप्रायः । न च लोके साध्यसमो हेतुः साध्यसिद्धौ सिद्धिनिमित्तं प्रयुज्यते प्रमाणकुशलैरित्यर्थः । हेतुरिति दृष्टान्तोऽत्राभिप्रेतः, गमकत्वात् । प्रकृतो हि दृष्टान्तो न हेतुरिति ॥ २० ॥