पूर्वापरापरिज्ञानमजातेः परिदीपकम् ।
जायमानाद्धि वै धर्मात्कथं पूर्वं न गृह्यते ॥ २१ ॥
जायमानाद्धि वै धर्मात्कथं पूर्वं न गृह्यते ॥ २१ ॥
pūrvāparāparijñānamajāteḥ paridīpakam .
jāyamānāddhi vai dharmātkathaṃ pūrvaṃ na gṛhyate .. 21 ..
[हेतु और फल के] पौर्वापर्य का जो अज्ञान है वह अनुत्पत्ति का ही प्रकाशक है, क्योंकि यदि कार्य [सचमुच] उत्पन्न हुआ होता तो उसका कारण क्यों न ग्रहण किया जाता? ॥ २१ ॥
यह जो हेतु और फल के पौर्वापर्य का अज्ञान है वह अजाति का ही परिदीपक अर्थात् ज्ञापक है । यदि कार्य उत्पन्न होता ग्रहण किया जाता है तो उससे पूर्ववर्ती कारण क्यों नहीं ग्रहण किया जाता? उत्पन्न होनेवाली वस्तु को ग्रहण करनेवाले पुरुष द्वारा उसकी उत्पत्ति का कारण भी अवश्य ही ग्रहण किया जाना चाहिये, क्योंकि जन्य और जनक पदार्थों का सम्बन्ध अनिवार्य है । इसलिये तात्पर्य यह है कि यह अजाति का ही प्रकाशक है ॥ २१ ॥
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यदेतद्धेतुफलयोः पूर्वापरापरिज्ञानं तच्चैतदजातेः परिदीपकमवबोधकमित्यर्थः । जायमानो हि चेद्धर्मो गृह्यते, कथं तस्मात्पूर्वं कारणं न गृह्यते । अवश्यं हि जायमानस्य ग्रहीत्रा तज्जनकं ग्रहीतव्यम् । जन्यजनकयोः सम्बन्धस्यानपेतत्वात् । तस्मादजातिपरिदीपकं तदित्यर्थः ॥ २१ ॥
सदसदादिवादोंकी अनुपपत्ति
इसलिये भी कोई वस्तु उत्पन्न नहीं होती, क्योंकि उत्पन्न होनेवाली वस्तु—
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इतश्च न जायते किञ्चित्, यज्जायमानं वस्तु—