सदसत्सदसद्वापि न किञ्चिद्वस्तु जायते ॥ २२ ॥
svato vā parato vāpi na kiñcidvastu jāyate .
sadasatsadasadvāpi na kiñcidvastu jāyate .. 22 ..
अपने से, दूसरे से अथवा दोनोंही से सत्, असत् अथवा सदसद्रूप से उत्पन्न नहीं होती—किसी भी प्रकार उसका जन्म होना सम्भव नहीं है । जिस प्रकार घड़ा उसी घड़े से उत्पन्न नहीं हो सकता उसी प्रकार कोई भी वस्तु स्वयं अपने अपरिनिष्पन्न (पूर्णतया तैयार न हुए) स्वरूप से स्वतः ही उत्पन्न नहीं हो सकती । और न किसी अन्य से ही अन्य की उत्पत्ति हो सकती है; जैसे घट से पट की अथवा पट से पटान्तर की । तथा इसी तरह, विरोध होने के कारण दोनों से भी किसी की उत्पत्ति नहीं हो सकती; जिस प्रकार कि घट और पट दोनों से घट या पट कोई उत्पन्न नहीं हो सकता ।
यदि कहो कि मिट्टी से घड़ा उत्पन्न होता है और पिता से पुत्र का जन्म होता है तो; ठीक है, परन्तु ‘उत्पन्न होता है’ ऐसा शब्द और उसकी प्रतीति मूर्खों को ही हुआ करती है । विवेकी लोग तो उन शब्द और प्रतीति की—वे सत्य हैं अथवा मिथ्या— इस प्रकार परीक्षा किया करते हैं ।
किन्तु परीक्षा की जाने पर तो शब्द और उसकी प्रतीति की विषयभूत घट अथवा पुत्रादिरूप वस्तु केवल शब्दमात्र ही है; जैसा कि “वाचारम्भणम्” इत्यादि श्रुति से प्रमाणित होता है ।
यदि वस्तु सत् (विद्यमान) है तो मृत्तिका और पिता आदि के समान सत् होने के कारण ही उत्पन्न नहीं हो सकती । यदि असत् है तो भी शशशृङ्गादि के समान असत् होने के कारण ही उत्पन्न नहीं हो सकती । और यदि सदसत् है तो भी उत्पन्न नहीं हो सकती, क्योंकि एक ही वस्तु विरुद्ध स्वभाववाली होनी असम्भव है । अतः यही सिद्ध हुआ कि कोई भी वस्तु उत्पन्न नहीं होती ।
इसके विपरीत जिन (बौद्धों)-के मत में जन्मक्रिया का ही जन्म होता है— इस प्रकार जो क्रिया, कारक और फल की एकता तथा वस्तु का क्षणिकत्व स्वीकार करते हैं वे तो बिलकुल ही युक्तिशून्य हैं क्योंकि ‘यह ऐसा है’ इस प्रकार निश्चय करने के क्षण से दूसरे ही क्षण में स्थिति न रहने के कारण [पदार्थ का अनुभव नहीं हो सकता]; और बिना अनुभव हुए पदार्थ की स्मृति होना असम्भव है ॥ २२ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
स्वतः परत उभयतो वा सदसत्सदसद्वा न जायते न तस्य केनचिदपि प्रकारेण जन्म सम्भवति । न तावत्स्वयमेवापरिनिष्पन्नात्स्वतः स्वरूपात्स्वयमेव जायते यथा घटस्तस्मादेव घटात् । नापि परतोऽन्यस्मादन्यो यथा घटात्पटः पटात्पटान्तरम् । तथा नोभयतः, विरोधात्; यथा घटपटाभ्यां घटः पटो वा न जायते ।
ननु मृदो घटो जायते पितुश्च पुत्रः । सत्यम्, अस्ति जायत इति प्रत्ययः शब्दश्च मूढानाम् । तावेव शब्दप्रत्ययौ विवेकिभिः परीक्ष्येते किं सत्यमेव तावुत मृषेति ।
यावता परीक्ष्यमाणे शब्दप्रत्ययविषयं वस्तु घटपुत्रादिलक्षणं शब्दमात्रमेव तत् । “वाचारम्भणम्” (छा० उ० ६ । १ । ४) इति श्रुतेः ।
सच्चेन्न जायते सत्त्वान्मृत्पित्रादिवत् । यद्यसत्तथापि न जायतेऽसत्त्वादेव शशविषाणादिवत् । अथ सदसत्तथापि न जायते विरुद्धस्यैकस्यासम्भवात् । अतो न किञ्चिद्वस्तु जायत इति सिद्धम् ।
येषां पुनर्जनिरेव जायत इति क्रियाकारकफलैकत्वमभ्युपगम्यते क्षणिकत्वं च वस्तुनः, ते दूरत एव न्यायापेताः । इदमित्थमित्यवधारणक्षणान्तरानवस्थानादननुभूतस्य स्मृत्यनुपपत्तेश्च ॥ २२ ॥