अलातशान्ति प्रकरण - कारिका 23

हेतुर्न जायतेऽनादेः फलं चापि स्वभावतः ।
आदिर्न विद्यते यस्य तस्य ह्यादिर्न विद्यते ॥ २३ ॥

heturna jāyate’nādeḥ phalaṃ cāpi svabhāvataḥ .
ādirna vidyate yasya tasya hyādirna vidyate .. 23 ..


अनादि फल से कोई हेतु उत्पन्न नहीं हो सकता और इसी प्रकार स्वभाव से ही [अनादि हेतु से] फल की भी उत्पत्ति नहीं हो सकती, क्योंकि जिस वस्तु का कोई आदि (कारण) नहीं होता उसका आदि (जन्म) भी नहीं होता ॥ २३ ॥

अनादि अर्थात् आदिरहित फल से हेतु उत्पन्न नहीं होता । जिसकी कभी उत्पत्ति नहीं हुई ऐसे अनादि फल से तो तुम हेतु का जन्म मानते ही नहीं हो और न ऐसा ही मानते हो कि अनादिआदिरहित अर्थात् अजन्मा हेतु से बिना किसी निमित्त के स्वभावतः ही फल की उत्पत्ति हो जाती है ।

अतः हेतु और फल का अनादित्व माननेवाले तुम्हारे द्वारा उनकी अनुत्पत्ति ही स्वीकार कर ली जाती है, क्योंकि लोक में जिस वस्तु का आदिकारण नहीं होता उसका आदि अर्थात् पूर्वोक्त जन्म भी नहीं होता । जिसका कोई कारण होता है उसीका जन्म भी माना जाता है; कारणरहित पदार्थ का नहीं ॥ २३ ॥

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अनादेरादिरहितात्फलाद्धेतुर्न जायते । न ह्यनुत्पन्नादनादेः फलाद्धेतोर्जन्मेष्यते त्वया । फलं चादिरहितादनादेर्हेतोरजातस्वभावत एव निर्निमित्तं जायत इति नाभ्युपगम्यते ।

तस्मादनादित्वमभ्युपगच्छता त्वया हेतुफलयोरजन्मैवाभ्युपगम्यते । यस्मादादिः कारणं न विद्यते यस्य लोके तस्य ह्यादिः पूर्वोक्ता जातिर्न विद्यते । कारणवत एव ह्यादिरभ्युपगम्यते नाकारणवतः ॥ २३ ॥


बाह्यार्थवाद-निरूपण

पूर्वोक्त अर्थ को ही पुष्ट करने की इच्छा से फिर दोष प्रदर्शित करते हैं—
संस्कृत भाष्य पढ़ें
उक्तस्यैवार्थस्य दृढीकरणचिकीर्षया पुनराक्षिपति—