संक्लेशस्योपलब्धेश्च परतन्त्रास्तिता मता ॥ २४ ॥
prajñapteḥ sanimittatvamanyathā dvayanāśataḥ .
saṃkleśasyopalabdheśca paratantrāstitā matā .. 24 ..
प्रज्ञान अर्थात् शब्दादि-प्रतीति का नाम प्रज्ञप्ति है । वह सनिमित्त है । निमित्तकारण अर्थात् विषय को कहते हैं; अतः सनिमित्त—सविषय यानी अपने से अतिरिक्त विषय के सहित है—ऐसी हम [उसके विषय में] प्रतिज्ञा करते हैं । [अर्थात् हमारा कथन है कि] प्रज्ञप्ति यानी शब्दादि-प्रतीति निर्विषया नहीं हो सकती, क्योंकि वह सनिमित्ता है । अन्यथा उसे निर्विषय मानने पर तो शब्द, स्पर्श एवं नील, पीत और लोहित आदि प्रतीति की विचित्रतारूप द्वैत का नाश हो जायगा अर्थात् उसके नाश यानी अभाव का प्रसंग उपस्थित हो जायगा और प्रत्यक्ष-सिद्ध होने के कारण प्रत्ययवैचित्र्यरूप द्वैत का अभाव है नहीं । अतः प्रत्ययवैचित्र्यरूप द्वैत की उपलब्धि से, परतन्त्र यानी दूसरों के शास्त्र; उन परकीय तन्त्रों का अर्थात् परकीय तन्त्रों के आश्रित जो प्रज्ञान के अतिरिक्त अन्य बाह्य पदार्थ हैं उनका अस्तित्व भी स्वीकार किया गया है ।
केवल प्रकाशमात्रस्वरूपा प्रज्ञप्ति की यह विचित्रता नील-पीतादि बाह्य आलम्बनों की विचित्रता के सिवा केवल स्वभावभेद से ही होनी सम्भव नहीं है । तात्पर्य यह है कि स्फटिक के समान, नील-पीतादि उपाधियों को आश्रय किये बिना, यह विचित्रता नहीं हो सकती ।
इसके सिवा इसलिये भी दूसरों के शास्त्रों के आश्रित ज्ञानव्यतिरिक्त बाह्य पदार्थों का अस्तित्व स्वीकार किया गया है कि अग्निदाहादि के कारण से होनेवाला संक्लेश यानी दुःख उपलब्ध होता है । संक्लेश का अर्थ संक्लेशन अर्थात् दुःख है । यदि विज्ञान से अतिरिक्त दाहादि का निमित्तभूत अग्नि आदि कोई बाह्य पदार्थ न होता तो दाहादिजनित दुःख उपलब्ध नहीं होना चाहिये था । किन्तु उपलब्ध होता ही है; इससे हम मानते हैं कि बाह्य पदार्थ अवश्य है । अभिप्राय यह है कि केवल विज्ञानमात्र में क्लेश होना सम्भव नहीं है, क्योंकि अन्यत्र ऐसा नहीं देखा गया ॥ २४ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
प्रज्ञानं प्रज्ञप्तिः शब्दादिप्रतीतिस्तस्याः सनिमित्तत्वम्; निमित्तं कारणं विषय इत्येतत्सनिमित्तत्वं सविषयत्वं स्वात्मव्यतिरिक्तविषयतेत्येतत् प्रतिजानीमहे । न हि निर्विषया प्रज्ञप्तिः शब्दादिप्रतीतिः स्यात्, तस्याः सनिमित्तत्वात् । अन्यथा निर्विषयत्वे शब्दस्पर्शनीलपीतलोहितादिप्रत्ययवैचित्र्यस्य द्वयस्य नाशतो नाशोऽभावः प्रसज्येतेत्यर्थः ।
न च प्रत्ययवैचित्र्यस्य द्वयस्याभावोऽस्ति प्रत्यक्षत्वात् । अतः प्रत्ययवैचित्र्यस्य द्वयस्य दर्शनात्, परेषां तन्त्रं परतन्त्रमित्यन्यशास्त्रम्, तस्य परतन्त्रस्य परतन्त्राश्रयस्य बाह्यार्थस्य ज्ञानव्यतिरिक्तस्यास्तिता मताभिप्रेता ।
न हि प्रज्ञप्तेः प्रकाशमात्रस्वरूपाया नीलपीतादिबाह्यालम्बनवैचित्र्यमन्तरेण स्वभावभेदेनैव वैचित्र्यं सम्भवति । स्फटिकस्येव नीलाद्युपाध्याश्रयैर्विना वैचित्र्यं न घटत इत्यभिप्रायः ।
इतश्च परतन्त्राश्रयस्य बाह्यार्थस्य ज्ञानव्यतिरिक्तस्यास्तिता । संक्लेशनं संक्लेशो दुःखमित्यर्थः । उपलभ्यते ह्यग्निदाहादिनिमित्तं दुःखम् । यद्यग्न्यादिबाह्यं दाहादिनिमित्तं विज्ञानव्यतिरिक्तं न स्यात्ततो दाहादिदुःखं नोपलभ्येत । उपलभ्यते तु । अतस्तेन मन्यामहेऽस्ति बाह्योऽर्थ इति ।
न हि विज्ञानमात्रे संक्लेशो युक्तः, अन्यत्रादर्शनादित्यभिप्रायः ॥ २४ ॥