अलातशान्ति प्रकरण - कारिका 25

प्रज्ञप्तेः सनिमित्तत्वमिष्यते युक्तिदर्शनात् ।
निमित्तस्यानिमित्तत्वमिष्यते भूतदर्शनात् ॥ २५ ॥

prajñapteḥ sanimittatvamiṣyate yuktidarśanāt .
nimittasyānimittatvamiṣyate bhūtadarśanāt .. 25 ..


पूर्वोक्त युक्ति के अनुसार तुम प्रज्ञप्ति का सविषयत्व स्वीकार करते हो । परन्तु तत्त्वदृष्टि से हम उस विषय का अविषयत्व मानते हैं ॥ २५ ॥

ठीक है, इस प्रकार दुःखमय द्वैत की उपलब्धिरूप युक्ति के अनुसार तुम प्रज्ञप्ति का सविषयत्व स्वीकार करते हो; परन्तु ‘युक्तिदर्शन वस्तु की यथार्थता के ज्ञान में कारण है’—अपने इस सिद्धान्त में तुम स्थिर हो जाओ ।

बाह्यार्थवादी—कहिये, उससे क्या आपत्ति होती है?

विज्ञानवादी—हमारा कथन है कि प्रज्ञप्ति के आश्रयरूप से स्वीकार किये हुए घटादि विषय का हम अविषयत्वप्रतीति का अनाश्रयत्व अर्थात् विचित्रता का अहेतुत्व मानते हैं । कैसे मानते हैं? भूतदृष्टि से अर्थात् परमार्थदृष्टि से । जिस प्रकार अश्व से महिष पृथक् है, उस प्रकार मृत्तिका के यथार्थ स्वरूप का ज्ञान होने पर, घट उससे पृथक् सिद्ध नहीं होता । इसी प्रकार तन्तु से पृथक् पट और अंशु से पृथक् तन्तु भी सिद्ध नहीं होते । तात्पर्य यह है कि इसी तरह उत्तरोत्तर यथार्थ तत्त्व को देखते-देखते शब्द प्रतीति का निरोध हो जाने पर हम कोई भी विषय नहीं देखते ।

अथवा [यों समझो कि] जिस प्रकार रज्जु आदि में आरोपित सर्पादि वस्तुतः प्रतीति के आलम्बन नहीं हैं उसी प्रकार अभूतदर्शन के कारण हम बाह्यार्थों को प्रतीति का आलम्बन नहीं मानते । भ्रान्तिदृष्टि के विषय होने के कारण इन निमित्तों का अनिमित्तत्व है, क्योंकि उसका अभाव होने पर इनकी भी उपलब्धि नहीं होती । सोये हुए, समाधिस्थ और मुक्त पुरुषों को, उनकी भ्रान्तिदृष्टि का अभाव हो जाने पर, आत्मा से अतिरिक्त किसी बाह्य पदार्थ की उपलब्धि नहीं होती । उन्मत्त पुरुष को दिखायी देनेवाली वस्तु उन्मादशून्य मनुष्य को भी यथार्थ नहीं जान पड़ती । इस कथन से द्वैतदर्शन और क्लेश की उपलब्धि दोनोंही का निराकरण किया गया है ॥ २५ ॥

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बाढमेवं प्रज्ञप्तेः सनिमित्तत्वं द्वयसंक्लेशोपलब्धियुक्तिदर्शनादिष्यते त्वया । स्थिरीभव तावत्त्वं युक्तिदर्शनं वस्तुनस्तथात्वाभ्युपगमे कारणमित्यत्र ।

ब्रूहि किं तत इति ।

उच्यते । निमित्तस्य प्रज्ञप्त्यालम्बनाभिमतस्य घटादेरनिमित्तत्वमनालम्बनत्वं वैचित्र्याहेतुत्वमिष्यतेऽस्माभिः । कथम्? भूतदर्शनात्परमार्थदर्शनादित्येतत् ।

न हि घटो यथाभूतमृद्रूपदर्शने सति तद्व्यतिरेकेणास्ति, यथाश्वान्महिषः पटो वा तन्तुव्यतिरेकेण, तन्तवश्चांशुव्यतिरेकेणेत्येवमुत्तरोत्तरभूतदर्शन आ शब्दप्रत्ययनिरोधान्नैव निमित्तमुपलभामह इत्यर्थः ।

अथवाभूतदर्शनाद्बाह्यार्थस्यानिमित्तत्वमिष्यते, रज्ज्वादाविव सर्पादेरित्यर्थः । भ्रान्तिदर्शनविषयत्वाच्च निमित्तस्यानिमित्तत्वं भवेत् । तदभावेऽभावात् । न हि सुषुप्तसमाहितमुक्तानां भ्रान्तिदर्शनाभाव आत्मव्यतिरिक्तो बाह्योऽर्थ उपलभ्यते । न ह्युन्मत्तावगतं वस्त्वनुन्मत्तैरपि तथाभूतं गम्यते । एतेन द्वयदर्शनं संक्लेशोपलब्धिश्च प्रत्युक्ता ॥ २५ ॥


क्योंकि बाह्य विषय है ही नहीं, इसलिये—
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यस्मान्नास्ति बाह्यं निमित्तमतः—