अलातशान्ति प्रकरण - कारिका 26

चित्तं न संस्पृशत्यर्थं नार्थाभासं तथैव च ।
अभूतो हि यतश्चार्थो नार्थाभासस्ततः पृथक् ॥ २६ ॥

cittaṃ na saṃspṛśatyarthaṃ nārthābhāsaṃ tathaiva ca .
abhūto hi yataścārtho nārthābhāsastataḥ pṛthak .. 26 ..


चित्त किसी पदार्थ का स्पर्श नहीं करता और इसी प्रकार न किसी अर्थाभास का ही ग्रहण करता है । क्योंकि पदार्थ है ही नहीं, इसलिये पदार्थाभास भी उस चित्त से पृथक् नहीं है ॥ २६ ॥
चित्त, चित्त होने के कारण ही स्वप्नचित्त के समान, बाह्य आलम्बन के विषयभूत किसी पदार्थ को स्पर्श नहीं करता और न अर्थाभास को ही ग्रहण करता है, क्योंकि उपर्युक्त हेतु से ही स्वप्नगत पदार्थों के समान जागरित अवस्था में भी शब्दादि बाह्य पदार्थ हैं नहीं और न चित्त से पृथक् अर्थाभास ही है । घटादि पदार्थों के समान चित्त ही भासता है, जैसा कि वह स्वप्न में भासा करता है ॥ २६ ॥
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चित्तं न स्पृशत्यर्थं बाह्यालम्बनविषयम्, नाप्यर्थाभासं चित्तत्वात्स्वप्नचित्तवत् । अभूतो हि जागरितेऽपि स्वप्नार्थवदेव बाह्यः शब्दाद्यर्थो यत उक्तहेतुत्वाच्च । नाप्यर्थाभासश्चित्तात्पृथक्चित्तमेव हि घटाद्यर्थवदवभासते यथा स्वप्ने ॥ २६ ॥

घटादि के न होने पर भी चित्त को घटादि की प्रतीति होना—यह तो विपरीत ज्ञान है । ऐसी अवस्था में अविपरीत (सम्यक्) ज्ञान कब होगा? यह बतलाना चाहिये । इस पर कहते हैं—
संस्कृत भाष्य पढ़ें
ननु विपर्यासस्तर्ह्यसति घटादौ घटाद्याभासता चित्तस्य । तथा च सत्यविपर्यासः क्वचिद्वक्तव्य इति । अत्रोच्यते—