निमित्तं न सदा चित्तं संस्पृशत्यध्वसु त्रिषु ।
अनिमित्तो विपर्यासः कथं तस्य भविष्यति ॥ २७ ॥
अनिमित्तो विपर्यासः कथं तस्य भविष्यति ॥ २७ ॥
nimittaṃ na sadā cittaṃ saṃspṛśatyadhvasu triṣu .
animitto viparyāsaḥ kathaṃ tasya bhaviṣyati .. 27 ..
[भूत, भविष्यत् और वर्तमान] तीनों अवस्थाओं में चित्त कभी किसी विषय को स्पर्श नहीं करता । फिर उसे बिना निमित्त के ही विपरीत ज्ञान कैसे हो सकता है? ॥ २७ ॥
अतीत, अनागत और वर्तमान—इन तीनों ही अवस्थाओं में चित्त कभी निमित्त यानी विषय को स्पर्श नहीं करता । यदि वह कभी उसे स्पर्श करता तो ‘वह अविपर्यास अर्थात् परमार्थ है’ ऐसा माना जाता । अतः उसकी अपेक्षा से ही घट के न होने पर भी घट का प्रतीत होना विपर्यास कहलाता । किन्तु चित्त का पदार्थ के साथ कभी स्पर्श है ही नहीं । अतः बिना निमित्त के ही उस चित्त को विपरीत ज्ञान कैसे हो सकता है? तात्पर्य यह है कि उसे किसी प्रकार विपरीत ज्ञान है ही नहीं । चित्त का यही स्वभाव है कि घटादि निमित्त के न होने पर भी उनकी प्रतीति होती रहे ॥ २७ ॥
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निमित्तं विषयमतीतानागतवर्तमानाध्वसु त्रिष्वपि सदा चित्तं न स्पृशेदेव हि । यदि हि क्वचित् संस्पृशेत् सोऽविपर्यासः परमार्थ इति । अतस्तदपेक्षयासति घटे घटाद्याभासता विपर्यासः स्यान्न तु तदस्ति कदाचिदपि चित्तस्यार्थसंस्पर्शनम् । तस्मादनिमित्तो विपर्यासः कथं तस्य चित्तस्य भविष्यति; न कथञ्चिद्विपर्यासोऽस्तीत्यभिप्रायः । अयमेव हि स्वभावश्चित्तस्य यदुतासति निमित्ते घटादौ तद्वदवभासनम् ॥ २७ ॥
विज्ञानवादका खण्डन
“प्रज्ञप्तेः सनिमित्तत्वम्” इस (पच्चीसवें) श्लोक से लेकर यहाँ तक आचार्य ने विज्ञानवादी बौद्ध के, बाह्यार्थवादी के पक्ष का प्रतिषेध करनेवाले वचन का अनुमोदन किया । अब उसी को हेतु बनाकर उसी के पक्ष का प्रतिषेध करने के लिये इस प्रकार कहा जाता है—
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प्रज्ञप्तेः सनिमित्तत्वमित्याद्येतदन्तं विज्ञानवादिनो बौद्धस्य वचनं बाह्यार्थवादिपक्षप्रतिषेधपरमाचार्येणानुमोदितम् । तदेव हेतुं कृत्वा तत्पक्षप्रतिषेधाय तदिदमुच्यते—