अलातशान्ति प्रकरण - कारिका 28

तस्मान्न जायते चित्तं चित्तदृश्यं न जायते ।
तस्य पश्यन्ति ये जातिं खे वै पश्यन्ति ते पदम् ॥ २८ ॥

tasmānna jāyate cittaṃ cittadṛśyaṃ na jāyate .
tasya paśyanti ye jātiṃ khe vai paśyanti te padam .. 28 ..


इसलिये चित्त भी उत्पन्न नहीं होता और न चित्त का दृश्य ही उत्पन्न होता है । जो लोग उसका जन्म देखते हैं वे निश्चय ही आकाश में [पक्षी आदिके] चरण (चरणचिह्न) देखते हैं ॥ २८ ॥

क्योंकि विज्ञानवादी ने घटादि के न हो ने पर भी चित्त को घटादि की प्रतीति होनी स्वीकार की है और यथार्थदृष्टि हो ने के कारण उसका हम ने भी अनुमोदन किया है, इसलिये उसकी मानी हुई चित्त की उत्पत्ति की प्रतीति भी उसकी उत्पत्ति के अभाव में ही होनी सम्भव है । अतः जिस प्रकार चित्त के दृश्य का जन्म नहीं होता उसी प्रकार चित्त की भी उत्पत्ति नहीं होती ।

इसलिये जो विज्ञानवादी उस चित्त की उत्पत्ति तथा उसके क्षणिकत्व, दुःखित्व, शून्यत्व एवं अनात्मत्व आदि देखते हैं—उस चित्त से ही, जिसका देखना सर्वथा असम्भव है, ऐ से चित्त के स्वरूप को देखनेवाले वे निश्चय ही आकाश में पक्षी आदि के चरण देखते हैं । अतः तात्पर्य यह है कि वे अन्य द्वैतवादियों की अपेक्षा भी अधिक साहसी हैं । और जो शून्यवादी सब की शून्यता देखते हुए अप ने दर्शन की भी शून्यता की प्रतिज्ञा करते हैं वे तो उनसे भी बढ़कर साहसी हैं—वे आकाश को मुट्ठी से ही पकड़ना चाहते हैं ॥ २८ ॥

संस्कृत भाष्य पढ़ें

यस्मादसत्येव घटादौ घटाद्याभासता चित्तस्य विज्ञानवादिनाभ्युपगता तदनुमोदितम् अस्माभिरपि भूतदर्शनात्, तस्मात्तस्यापि चित्तस्य जायमानावभासतासत्येव जन्मनि युक्ता भवितुमित्यतो न जायते चित्तम्, यथा चित्तदृश्यं न जायते ।

अतस्तस्य चित्तस्य ये जातिं पश्यन्ति विज्ञानवादिनः क्षणिकत्वदुःखित्वशून्यत्वानात्मत्वादि च, तेनैव चित्तेन चित्तस्वरूपं द्रष्टुमशक्यं पश्यन्तः खे वै पश्यन्ति ते पदं पक्ष्यादीनाम् । अत इतरेभ्योऽपि द्वैतिभ्योऽत्यन्तसाहसिका इत्यर्थः । येऽपि शून्यवादिनः पश्यन्त एव सर्वशून्यतां स्वदर्शनस्यापि शून्यतां प्रतिजानते ते ततोऽपि साहसिकतराः खं मुष्टिनापि जिघृक्षन्ति ॥ २८ ॥


उपक्रमका उपसंहार

पूर्वोक्त हेतुओं से यह सिद्ध हुआ कि एक अजन्मा ब्रह्म ही है । अब, पहले जिसकी प्रतिज्ञा की है उसके फल का उपसंहार कर ने के लिये यह श्लोक है—
संस्कृत भाष्य पढ़ें
उक्तैर्हेतुभिरजमेकं ब्रह्मेति सिद्धं यत्पुनरादौ प्रतिज्ञातं तत्फलोपसंहारार्थोऽयं श्लोकः—