अलातशान्ति प्रकरण - कारिका 29

अजातं जायते यस्मादजातिः प्रकृतिस्ततः ।
प्रकृतेरन्यथाभावो न कथञ्चिद्भविष्यति ॥ २९ ॥

ajātaṃ jāyate yasmādajātiḥ prakṛtistataḥ .
prakṛteranyathābhāvo na kathañcidbhaviṣyati .. 29 ..


क्योंकि अजन्मा [चित्त]-का ही जन्म होता है, इसलिये अजाति ही उसका स्वभाव है; और स्वभाव की विपरीतता किसी प्रकार नहीं होगी ॥ २९ ॥
अजात जो ब्रह्मरूप चित्त है वही उत्पन्न होता है—ऐसी वादियोंद्वारा कल्पना की जाती है; क्योंकि उस अजात का ही जन्म होता है, इसलिये अजाति उसका स्वभाव है तब, इसीलिये उस अजातरूप स्वभाव का जन्मरूप विपरीतभाव किसी प्रकार नहीं होगा ॥ २९ ॥
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अजातं यच्चित्तं ब्रह्मैव जायत इति वादिभिः परिकल्प्यते तदजातं जायते यस्मादजातिः प्रकृतिस्तस्य । ततस्तस्मादजातरूपायाः प्रकृतेरन्यथाभावो जन्म न कथञ्चिद्भविष्यति ॥ २९ ॥

आत्मा के संसार और मोक्ष—दोनोंही का पारमार्थिक अस्तित्व स्वीकार करनेवाले वादियों के पक्ष का यह एक दूसरा दोष बतलाया जाता है—
संस्कृत भाष्य पढ़ें
अयं चापर आत्मनः संसारमोक्षयोः परमार्थसद्भाववादिनां दोष उच्यते—