अलातशान्ति प्रकरण - कारिका 3

भूतस्य जातिमिच्छन्ति वादिनः केचिदेव हि ।
अभूतस्यापरे धीरा विवदन्तः परस्परम् ॥ ३ ॥

bhūtasya jātimicchanti vādinaḥ kecideva hi .
abhūtasyāpare dhīrā vivadantaḥ parasparam .. 3 ..


उनमें से कोई-कोई वादी तो सत् पदार्थ की उत्पत्ति मानते हैं और कोई दूसरे बुद्धिशाली परस्पर विवाद करते हुए असत्पदार्थ की उत्पत्ति स्वीकार करते हैं ॥ ३ ॥
कोई-कोई वादी—केवल सांख्य-मतावलम्बी, सम्पूर्ण द्वैतवादी नहीं—भूत यानी विद्यमान वस्तु की जाति—उत्पत्ति मानते हैं; और क्योंकि दूसरे धीर—बुद्धिमान् यानी प्राज्ञाभिमानी वैशेषिक और नैयायिक लोग अभूत अर्थात् अविद्यमान वस्तु का जन्म स्वीकार करते हैं, इसलिये परस्पर विवाद यानी विरुद्ध भाषण करते हुए वे एक-दूसरे को जीतने की इच्छा करते रहते हैं—यह इसका तात्पर्य है ॥ ३ ॥
तात्पर्य पढ़ें
भूतस्य विद्यमानस्य वस्तुनो जातिमुत्पत्तिमिच्छन्ति वादिनः केचिदेव हि सांख्या न सर्व एव द्वैतिनः । यस्मादभूतस्याविद्यमानस्यापरे वैशेषिका नैयायिकाश्च धीरा धीमन्तः प्राज्ञाभिमानिन इत्यर्थो विवदन्तो विरुद्धं वदन्तो ह्यन्योन्यमिच्छन्ति जेतुमित्यभिप्रायः ॥ ३ ॥

परस्पर विवाद करके एक-दूसरे के पक्ष का खण्डन करनेवाले उन वादियों द्वारा किस सिद्धान्त का प्रकाश किया जाता है, सो बतलाते हैं—
तात्पर्य पढ़ें
तैरेवं विरुद्धवदनेनान्योन्यपक्षप्रतिषेधं कुर्वद्भिः किं ख्यापितं भवत्युच्यते—