अलातशान्ति प्रकरण - कारिका 30

अनादेरन्तवत्त्वं च संसारस्य न सेत्स्यति ।
अनन्तता चादिमतो मोक्षस्य न भविष्यति ॥ ३० ॥

anāderantavattvaṃ ca saṃsārasya na setsyati .
anantatā cādimato mokṣasya na bhaviṣyati .. 30 ..


अनादि संसार का तो कभी अन्तवत्त्व सिद्ध नहीं हो सकेगा और सादि मोक्ष की कभी अनन्तता नहीं हो सकेगी ॥ ३० ॥

अनादि—अतीतकोटि से रहित संसार का अन्तवत्त्व अर्थात् समाप्त होना युक्ति से सिद्ध नहीं होगा । लोक में कोई भी पदार्थ अनादि होकर अन्तवान् होता नहीं देखा गया है । यदि कहो कि बीजाङ्कुरसम्बन्ध की निरन्तरता का विच्छेद होता देखा गया है? तो ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि बीजाङ्कुरसन्तति कोई एक पदार्थ न हो ने के कारण उसके अनादित्व का निराकरण तो पहले कर दिया गया है ।

इसी प्रकार विज्ञानप्राप्ति के समय होनेवाले सादि मोक्ष की अनन्तता भी नहीं होगी, क्योंकि घटादि [जन्य पदार्थों]-में ऐसा देखा नहीं गया । यदि कहो कि घटादिनाश के समान अवस्तुरूप हो ने से [मोक्षमें] यह दोष नहीं आ सकता तो इससे मोक्ष के पारमार्थिक सद्भावविषयक प्रतिज्ञा की हानि होगी । इसके सिवा [यदि मोक्ष को असद्रूप ही माना जाय तो भी] शशशृङ्ग के समान असत् हो ने के कारण भी उसके आदिमत्त्व का अभाव ही है ॥ ३० ॥

संस्कृत भाष्य पढ़ें

अनादेरतीतकोटिरहितस्य संसारस्यान्तवत्त्वं समाप्तिर्न सेत्स्यति युक्तितः सिद्धिं नोपयास्यति । न ह्यनादिः सन्नन्तवान्कश्चित्पदार्थो दृष्टो लोके । बीजाङ्कुरसम्बन्धनैरन्तर्यविच्छेदो दृष्ट इति चेत्, न; एकवस्त्वभावेनापोदितत्वात् ।

तथानन्ततापि विज्ञानप्राप्तिकालप्रभवस्य मोक्षस्यादिमतो न भविष्यति, घटादिष्वदर्शनात् । घटादिविनाशवदवस्तुत्वाददोष इति चेत्, तथा च मोक्षस्य परमार्थसद्भावप्रतिज्ञाहानिः । असत्त्वादेव शशविषाणस्येवादिमत्त्वाभावश्च ॥ ३० ॥