अलातशान्ति प्रकरण - कारिका 32

सप्रयोजनता तेषां स्वप्ने विप्रतिपद्यते ।
तस्मादाद्यन्तवत्त्वेन मिथ्यैव खलु ते स्मृताः ॥ ३२ ॥

saprayojanatā teṣāṃ svapne vipratipadyate .
tasmādādyantavattvena mithyaiva khalu te smṛtāḥ .. 32 ..


उन (जाग्रत्पदार्थों)-की सप्रयोजनता स्वप्नावस्था में असिद्ध हो जाती है । अतः आदिअन्तयुक्त हो ने के कारण वे निश्चय ही मिथ्या मा ने गये हैं ॥ ३२ ॥
वैतथ्यप्रकरण में इन दोनों श्लोकों की व्याख्या की जा चु की है । यहाँ संसार और मोक्ष के अभाव के प्रसङ्ग में उन्हें फिर पढ़ दिया है ॥ ३१३२ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
वैतथ्ये कृतव्याख्यानौ श्लोकाविह संसारमोक्षाभावप्रसङ्गेन पठितौ ॥ ३१३२ ॥