अलातशान्ति प्रकरण - कारिका 35

मित्राद्यैः सह संमन्त्र्य संबुद्धो न प्रपद्यते ।
गृहीतं चापि यत्किञ्चित्प्रतिबुद्धो न पश्यति ॥ ३५ ॥

mitrādyaiḥ saha saṃmantrya saṃbuddho na prapadyate .
gṛhītaṃ cāpi yatkiñcitpratibuddho na paśyati .. 35 ..


[स्वप्नावस्थामें] मित्रादि के साथ मन्त्रणा कर [वह स्वप्नदर्शी पुरुष] जाग ने पर उ से नहीं पाता; तथा उसने जो कुछ [स्वप्नावस्थामें] ग्रहण किया होता है उ से जाग ने पर नहीं देखता ॥ ३५ ॥
[स्वप्नमें] मित्रादि के साथ मन्त्रणा कर के जाग पड़ ने पर फिर उसी मन्त्रणा को नहीं पाता और [उस समय] उसने जो कुछ स्वर्णादि ग्रहण किया होता है उ से भी प्राप्त नहीं करता । इसलिये भी स्वप्नावस्था में वह किसी देशान्तर को नहीं जाता ॥ ३५ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
मित्राद्यैः सह संमन्त्र्य तदेव मन्त्रणं प्रतिबुद्धो न प्रपद्यते । गृहीतं च यत्किञ्चिद्धिरण्यादि न प्राप्नोति । अतश्च न देशान्तरं गच्छति स्वप्ने ॥ ३५ ॥