स्वप्ने चावस्तुकः कायः पृथगन्यस्य दर्शनात् ।
यथा कायस्तथा सर्वं चित्तदृश्यमवस्तुकम् ॥ ३६ ॥
यथा कायस्तथा सर्वं चित्तदृश्यमवस्तुकम् ॥ ३६ ॥
svapne cāvastukaḥ kāyaḥ pṛthaganyasya darśanāt .
yathā kāyastathā sarvaṃ cittadṛśyamavastukam .. 36 ..
स्वप्न में जो शरीर होता है वह भी अवस्तु है, क्योंकि उससे भिन्न एक दूसरा शरीर [शय्या पर पड़ा हुआ] देखा जाता है । जैसा वह शरीर है वैसा ही सम्पूर्ण चित्तदृश्य अवस्तुरूप है ॥ ३६ ॥
स्वप्न में घूमता हुआ जो शरीर देखा जाता है वह अवस्तु है, क्योंकि उस स्वप्नप्रदेशस्थ शरीर से भिन्न एक और शरीर [शय्या पर पड़ा हुआ] देखा जाता है । जिस प्रकार स्वप्न में दिखायी देनेवाला शरीर असत् है उसी प्रकार जागरित अवस्था में सारा चित्तदृश्य, केवल चित्त का ही दृश्य हो ने के कारण, असत् है—यह इसका तात्पर्य है । प्रकृत अर्थ यह हुआ कि स्वप्न के समान हो ने के कारण जाग्रत्अवस्था भी असत् ही है ॥ ३६ ॥
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स्वप्ने चाटन्दृश्यते यः कायः सोऽवस्तुकस्ततोऽन्यस्य स्वापदेशस्थस्य पृथक्कायान्तरस्य दर्शनात् । यथा स्वप्नदृश्यः कायोऽसंस्तथा सर्वं चित्तदृश्यमवस्तुकं जागरितेऽपि चित्तदृश्यत्वादित्यर्थः । स्वप्नसमत्वादसज्जागरितमपीति प्रकरणार्थः ॥ ३६ ॥
स्वप्न और जाग्रत्का कार्य-कारणत्व व्यावहारिक है
जाग्रत्पदार्थों की असत्ता इसलिये भी है कि—
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इतश्चासत्त्वं जाग्रद्वस्तुनः—