अलातशान्ति प्रकरण - कारिका 37

ग्रहणाज्जागरितवत्तद्धेतुः स्वप्न इष्यते ।
तद्धेतुत्वात्तु तस्यैव सज्जागरितमिष्यते ॥ ३७ ॥

grahaṇājjāgaritavattaddhetuḥ svapna iṣyate .
taddhetutvāttu tasyaiva sajjāgaritamiṣyate .. 37 ..


जाग्रत् के समान ग्रहण किया जा ने के कारण स्वप्न उसका कार्य माना जाता है । किन्तु जाग्रत् का कार्य हो ने के कारण स्वप्नद्रष्टा के लिये ही जाग्रत्अवस्था सत्य मानी जाती है ॥ ३७ ॥

जागरित के समान ही ग्राह्यग्राहकरूप से स्वप्न का भी ग्रहण हो ने से इस स्वप्नावस्था का जाग्रत् कारण है, इसलिये वह स्वप्नावस्था तद्धेतुक यानी जाग्रत् का कार्य मानी जाती है । तद्धेतुक अर्थात् जाग्रत् का कार्य हो ने के कारण उस स्वप्नद्रष्टा के ही लिये जाग्रत्अवस्था सत्य है, औरों के लिये नहीं; जैसा कि स्वप्न—यह इसका तात्पर्य है ।

जिस प्रकार स्वप्न स्वप्नद्रष्टा को ही सत् अर्थात् साधारण विद्यमान वस्तु के समान भासता है उसी प्रकार उसका कारण हो ने से जाग्रत् की भी साधारण विद्यमान वस्तु के समान प्रतीति होती है । किन्तु वस्तुतः स्वप्न के समान ही वह साधारण विद्यमान वस्तु है नहीं—यह इसका अभिप्राय है ॥ ३७ ॥

संस्कृत भाष्य पढ़ें

जागरितवज्जागरितस्य इव ग्रहणाद् ग्राह्यग्राहकरूपेण स्वप्नस्य तज्जागरितं हेतुरस्य स्वप्नस्य स स्वप्नस्तद्धेतुर्जागरितकार्यमिष्यते । तद्धेतुत्वाज्जागरितकार्यत्वात्तस्यैव स्वप्नदृश एव सज्जागरितं न त्वन्येषाम् । यथा स्वप्न इत्यभिप्रायः ।

यथा स्वप्नः स्वप्नदृश एव सन्साधारणविद्यमानवस्तुवदवभासते तथा तत्कारणत्वात्साधारणविद्यमानवस्तुवदवभासमानं न तु साधारणं विद्यमानवस्तु स्वप्नवदेवेत्यभिप्रायः ॥ ३७ ॥


शंका—स्वप्न के कारण हो ने पर भी जाग्रत्पदार्थों का स्वप्न के समान अवस्तुत्व नहीं है, क्योंकि स्वप्न तो अत्यन्त चञ्चल है, किन्तु जाग्रत्अवस्था स्थिर देखी जाती है ।

समाधान—ठीक है, अविवेकियों के लिये ऐसी बात हो सकती है; किन्तु विवेकियों को तो किसी वस्तु की उत्पत्ति सिद्ध ही नहीं है । अतः—

संस्कृत भाष्य पढ़ें

ननु स्वप्नकारणत्वेऽपि जागरितवस्तुनो न स्वप्नवदवस्तुत्वम् । अत्यन्तचलो हि स्वप्नो जागरितं तु स्थिरं लक्ष्यते ।

सत्यमेवमविवेकिनां स्यात् । विवेकिनां तु न कस्यचिद्वस्तुन उत्पादः प्रसिद्धोऽतः—