अलातशान्ति प्रकरण - कारिका 38

उत्पादस्याप्रसिद्धत्वादजं सर्वमुदाहृतम् ।
न च भूतादभूतस्य सम्भवोऽस्ति कथञ्चन ॥ ३८ ॥

utpādasyāprasiddhatvādajaṃ sarvamudāhṛtam .
na ca bhūtādabhūtasya sambhavo’sti kathañcana .. 38 ..


उत्पत्ति के प्रसिद्ध न हो ने के कारण सब कुछ अज ही कहा जाता है । इसके सिवा सत् वस्तु से असत् की उत्पत्ति किसी प्रकार हो भी नहीं सकती ॥ ३८ ॥
उत्पत्ति के सिद्ध न हो ने से सब कुछ आत्मा ही है; इसलिये वेदान्तों में “सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजः” इत्यादि रूप से सब को अज ही कहा है । और तुम जो मानते हो कि सत् जाग्रत् से असत् स्वप्न की उत्पत्ति होती है, सो भी ठीक नहीं; क्योंकि लोक में भूत—विद्यमान वस्तु से असत् का जन्म नहीं हुआ करता । शशशृङ्गादि असत्पदार्थों का जन्म किसी भी प्रकार देख ने में नहीं आता ॥ ३८ ॥
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अप्रसिद्धत्वादुत्पादस्यात्मैव सर्वमित्यजं सर्वमुदाहृतं वेदान्तेषु “सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजः” (मु० उ० २ । १ । २) इति । यदपि मन्यसे जागरितात्सतोऽसत्स्वप्नो जायत इति तदसत् । न भूताद्विद्यमानादभूतस्यासतः सम्भवोऽस्ति लोके । न ह्यसतः शशविषाणादेः सम्भवो दृष्टः कथञ्चिदपि ॥ ३८ ॥

शंका—यह तो तुम्हीं ने कहा था कि स्वप्न जागरित का कार्य है; फिर ऐसा क्यों कहते हो कि उत्पत्ति सिद्ध ही नहीं होती?

समाधान—हम जिस प्रकार उनका कार्यकारणभाव मानते हैं, सो सुनो—

संस्कृत भाष्य पढ़ें

ननुक्तं त्वयैव स्वप्नो जागरितकार्यमिति तत्कथमुत्पादोऽप्रसिद्ध इत्युच्यते?

शृणु तत्र यथा कार्यकारणभावोऽस्माभिरभिप्रेत इति—