असज्जागरिते दृष्ट्वा स्वप्ने पश्यति तन्मयः ।
असत्स्वप्नेऽपि दृष्ट्वा च प्रतिबुद्धो न पश्यति ॥ ३९ ॥
असत्स्वप्नेऽपि दृष्ट्वा च प्रतिबुद्धो न पश्यति ॥ ३९ ॥
asajjāgarite dṛṣṭvā svapne paśyati tanmayaḥ .
asatsvapne’pi dṛṣṭvā ca pratibuddho na paśyati .. 39 ..
[जीव] जाग्रत्अवस्था में असत्पदार्थों को देखकर उन्हीं के संस्कार से युक्त हो उन्हें स्वप्न में देखता है, किन्तु स्वप्नावस्था में भी असत्पदार्थों को ही देखकर जाग ने पर उन्हें नहीं देखता ॥ ३९ ॥
जागरितअवस्था में असत् अर्थात् रज्जु में सर्प के समान कल्पना किये हुए अविद्यमान पदार्थों को देखकर उनके भाव से भावित हो स्वप्न में भी तन्मयभाव से जागरित के समान ग्राह्यग्राहकरूप से विकल्प करता हुआ उन्हें देखता है । तथा स्वप्न में भी असत् पदार्थों को देखकर जाग ने पर विकल्प न कर ने के कारण उन्हें नहीं देखता । ‘च’ शब्द से यह अभिप्राय है कि इसी प्रकार कभी जाग्रत् में देखकर भी उन पदार्थों को स्वप्न में नहीं देखता । इसीलिये यह कहा जाता है कि जाग्रत्अवस्था स्वप्न का कारण है, उ से परमार्थसत् मानकर ऐसा नहीं कहा जाता ॥ ३९ ॥
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असदविद्यमानं रज्जुसर्पवद्विकल्पितं वस्तु जागरिते दृष्ट्वा तद्भावभावितस्तन्मयः स्वप्नेऽपि जागरितवद्ग्राह्यग्राहकरूपेण विकल्पयन्पश्यति । तथासत्स्वप्नेऽपि दृष्ट्वा च प्रतिबुद्धो न पश्यत्यविकल्पयन् । च शब्दात्तथा जागरितेऽपि दृष्ट्वा स्वप्ने न पश्यति कदाचिदित्यर्थः । तस्माज्जागरितं स्वप्नहेतुरुच्यते न तु परमार्थसदिति कृत्वा ॥ ३९ ॥
परमार्थतः तो किसी का किसी भी प्रकार कार्यकारणभाव होना सम्भव नहीं है । किस प्रकार? [सो बतलाते हैं—]
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परमार्थतस्तु न कस्यचित्केनचिदपि प्रकारेण कार्यकारणभाव उपपद्यते । कथम्? —