भूतं न जायते किञ्चिदभूतं नैव जायते ।
विवदन्तोऽद्वया ह्येवमजातिं ख्यापयन्ति ते ॥ ४ ॥
विवदन्तोऽद्वया ह्येवमजातिं ख्यापयन्ति ते ॥ ४ ॥
bhūtaṃ na jāyate kiñcidabhūtaṃ naiva jāyate .
vivadanto’dvayā hyevamajātiṃ khyāpayanti te .. 4 ..
[किन्हीं का मत है—] ‘कोई सद्वस्तु उत्पन्न नहीं होती’ और [कोई कहते हैं—] ‘असद्वस्तु का जन्म नहीं होता’—इस प्रकार परस्पर विवाद करनेवाले ये अद्वैतवादी[*] अजाति (अजातवाद)-को ही प्रकाशित करते हैं ॥ ४ ॥
कोई भी भूत अर्थात् विद्यमान वस्तु, विद्यमान होने के कारण ही उत्पन्न नहीं होती; जैसे कि आत्मा—इस प्रकार कहकर असद्वादी, सांख्य के पक्ष सद्वाद का खण्डन करता है । तथा सांख्य भी ‘अभूत-अविद्यमान वस्तु अविद्यमान होने के कारण ही शशशृङ्ग के समान उत्पन्न नहीं हो सकती’—ऐसा कहकर असद्वादी के पक्ष असत् की उत्पत्ति का प्रतिषेध करता है । इस प्रकार परस्पर विवाद यानी विरुद्ध भाषण करनेवाले ये अद्वैतवादी—क्योंकि वस्तुतः ये अद्वैतवादी ही हैं—एक-दूसरे के पक्ष सज्जन्म और असज्जन्म का खण्डन करते हुए अर्थतः अजाति—अनुत्पत्ति को ही प्रकाशित करते हैं ॥ ४ ॥
[ * ]: यहाँ द्वैतवादियों को ही व्यंग से ‘अद्वैतवादी’ कहा है ।
संस्कृत भाष्य पढ़ें
भूतं विद्यमानं वस्तु न जायते किञ्चिद्विद्यमानत्वादेवात्मवदित्येवं वदन्नसद्वादी सांख्यपक्षं प्रतिषेधति सज्जन्म । तथा भूतमविद्यमानमविद्यमानत्वान्नैव जायते शशविषाणवदित्येवं वदन्सांख्योऽप्यसद्वादिपक्षमसज्जन्म प्रतिषेधति । विवदन्तो विरुद्धं वदन्तोऽद्वया अद्वैतिनो ह्येते अन्योन्यस्य पक्षौ सदसतोर्जन्मनी प्रतिषेधन्तोऽजातिमनुत्पत्तिमर्थात्ख्यापयन्ति प्रकाशयन्ति ते ॥ ४ ॥