अलातशान्ति प्रकरण - कारिका 41

विपर्यासाद्यथा जाग्रदचिन्त्यान्भूतवत्स्पृशेत् ।
तथा स्वप्ने विपर्यासाद्धर्मांस्तत्रैव पश्यति ॥ ४१ ॥

viparyāsādyathā jāgradacintyānbhūtavatspṛśet .
tathā svapne viparyāsāddharmāṃstatraiva paśyati .. 41 ..


जिस प्रकार मनुष्य भ्रान्तिवश जाग्रत्कालीन अचिन्त्य पदार्थों को यथार्थवत् ग्रहण करता है उसी प्रकार स्वप्न में भी भ्रान्तिवश [स्वप्नकालीन] पदार्थों को वहीं (उसी अवस्था में) देखता है ॥ ४१ ॥
जिस प्रकार कोई पुरुष विपर्यास अर्थात् अविवेक के कारण जाग्रत्-अवस्था में रज्जु-सर्पादि अचिन्तनीय अर्थात् जिनका चिन्तन नहीं किया जा सकता ऐसे पदार्थों को भूत-परमार्थवत् स्पर्श करते हुए-से कल्पना करता है । उसी प्रकार स्वप्न में विपर्यास के कारण ही वह हाथी आदि को देखता हुआ-सा कल्पना करता है; अर्थात् उन्हें वह उसी अवस्था में देखता है, न कि जाग्रत् से उत्पन्न होते हुए ॥ ४१ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
विपर्यासादविवेकतो यथा जाग्रज्जागरितेऽचिन्त्यान्भावानशक्यचिन्तनीयान् रज्जुसर्पादीन् भूतवत्परमार्थवत्स्पृशन्निव विकल्पयेदित्यर्थः कश्चिद्यथा, तथा स्वप्ने विपर्यासाद्धस्त्यादीन्धर्मान् पश्यन्निव विकल्पयति; तत्रैव पश्यति न तु जागरितादुत्पद्यमानानित्यर्थः ॥ ४१ ॥