उपलम्भात्समाचारादस्तिवस्तुत्ववादिनाम् ।
जातिस्तु देशिता बुद्धैरजातेस्त्रसतां सदा ॥ ४२ ॥
जातिस्तु देशिता बुद्धैरजातेस्त्रसतां सदा ॥ ४२ ॥
upalambhātsamācārādastivastutvavādinām .
jātistu deśitā buddhairajātestrasatāṃ sadā .. 42 ..
[वस्तुओं की] उपलब्धि और [वर्णाश्रमादि] आचार के कारण जो पदार्थों की सत्ता स्वीकार करते हैं तथा अजाति से भय मानते हैं, विद्वानों ने सर्वदा उन्हींके लिये जाति का उपदेश दिया है ॥ ४२ ॥
तथा बुद्ध यानी अद्वैतवादी विद्वानों ने जो जाति (जगत् की उत्पत्ति)-का उपदेश दिया है [उसका यह कारण है—] उपलम्भन का नाम उपलम्भ है उस उपलम्भ अर्थात् उपलब्धि से और समाचार—वर्णाश्रमादि धर्मों के सम्यक् आचरण से—इन दोनों कारणों से वस्तुओं का अस्तित्व माननेवाले अर्थात् ‘[द्वैत पदार्थों का] वस्तुत्व है’ ऐसा कहनेवाले दृढ़ आग्रही, श्रद्धालु और मन्द विवेकशील पुरुषों को [ब्रह्मात्मैक्यबोध की प्राप्तिरूप] अर्थ के उपायरूप से उस जाति का उपदेश दिया है [उसमें उनका यही तात्पर्य है कि] ‘अभी वे भले ही उसे स्वीकार कर लें, परन्तु वेदान्त का अभ्यास करतेकरते उन्हें स्वयं ही अजन्मा और अद्वितीय आत्मा-सम्बन्धी विवेक हो जायगा’ उन्होंने परमार्थबुद्धि से उसका उपदेश नहीं दिया; क्योंकि वे केवल श्रुति-परायण अविवेकी लोग स्थूलबुद्धि होने के कारण अपना नाश मानते हुए अजाति अर्थात् जन्मरहित वस्तु से सदा भय मानते हैं—यह इसका तात्पर्य है यही बात हमने “उपायः सोऽवताराय” इत्यादि श्लोक में (अद्वैतप्रकरण श्लो० १५ में) कही है ॥ ४२ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
यापि बुद्धैरद्वैतवादिभिर्जातिर्देशितोपदिष्टा, उपलम्भनम् उपलम्भस्तस्मादुपलब्धेरित्यर्थः; समाचाराद्वर्णाश्रमादिधर्मसमाचरणात्, ताभ्यां हेतुभ्यामस्तिवस्तुत्ववादिनाम् अस्ति वस्तुभाव इत्येवं वदनशीलानां दृढाग्रहवतां श्रद्दधानानां मन्दविवेकिनामर्थोपायत्वेन सा देशिता जातिः । तां गृह्णन्तु तावत् । वेदान्ताभ्यासिनां तु स्वयमेवाजाद्वयात्मविषयो विवेको भविष्यतीति न तु परमार्थबुद्ध्या ।
ते हि श्रोत्रियाः स्थूलबुद्धित्वादजातेः अजातिवस्तुनः सदा त्रस्यन्त्यात्मनाशं मन्यमाना अविवेकिन इत्यर्थः । उपायः सोऽवतारायेत्युक्तम् ॥ ४२ ॥