जातिदोषा न सेत्स्यन्ति दोषोऽप्यल्पो भविष्यति ॥ ४३ ॥
ajātestrasatāṃ teṣāmupalambhādviyanti ye .
jātidoṣā na setsyanti doṣo’pyalpo bhaviṣyati .. 43 ..
जो लोग इस प्रकार [पदार्थों की] उपलब्धि और [वर्णाश्रमादि के] आचारों के कारण अजन्मा वस्तु से डरनेवाले हैं और ‘द्वैत पदार्थ है’ ऐसा समझकर अद्वय आत्मा से विरुद्ध चलते हैं, अर्थात् द्वैत स्वीकार करते हैं, उन अजाति से भय माननेवाले श्रद्धालु और सन्मार्गावलम्बी पुरुषों को जातिदोष-जाति की उपलब्धि के कारण होनेवाले दोष सिद्ध नहीं होंगे, क्योंकि वे विवेकमार्ग में प्रवृत्त हैं ।
और यदि कुछ दोष होगा भी तो वह भी अल्प ही होगा; अर्थात् केवल सम्यग्दर्शन की अप्राप्ति के कारण होनेवाला दोष ही होगा ॥ ४३ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
ये चैवमुपलम्भात्समाचाराच्चाजातेरजातिवस्तुनस्त्रसन्तोऽस्तिवस्त्वित्यद्वयादात्मनो वियन्ति विरुद्धं यन्ति द्वैतं प्रतिपद्यन्त इत्यर्थः । तेषामजातेस्त्रसतां श्रद्दधानानां सन्मार्गावलम्बिनां जातिदोषा जात्युपलम्भकृता दोषा न सेत्स्यन्ति सिद्धिं नोपयास्यन्ति, विवेकमार्गप्रवृत्तत्वात् ।
यद्यपि कश्चिद्दोषः स्यात्सोऽप्यल्प एव भविष्यति । सम्यग्दर्शनाप्रतिपत्तिहेतुक इत्यर्थः ॥ ४३ ॥