अलातशान्ति प्रकरण - कारिका 43

अजातेस्त्रसतां तेषामुपलम्भाद्वियन्ति ये ।
जातिदोषा न सेत्स्यन्ति दोषोऽप्यल्पो भविष्यति ॥ ४३ ॥

ajātestrasatāṃ teṣāmupalambhādviyanti ye .
jātidoṣā na setsyanti doṣo’pyalpo bhaviṣyati .. 43 ..


द्वैत की उपलब्धि के कारण जो विपरीत मार्ग में प्रवृत्त होते हैं अजाति से भय माननेवाले उन लोगों के लिये जातिसम्बन्धी दोष सिद्ध नहीं हो सकते, [क्योंकि द्वैतवादी होने पर भी वे सन्मार्ग में प्रवृत्त तो हुए ही रहते हैं] । [और यदि होगा भी तो] थोड़ा-सा ही दोष होगा ॥ ४३ ॥

जो लोग इस प्रकार [पदार्थों की] उपलब्धि और [वर्णाश्रमादि के] आचारों के कारण अजन्मा वस्तु से डरनेवाले हैं और ‘द्वैत पदार्थ है’ ऐसा समझकर अद्वय आत्मा से विरुद्ध चलते हैं, अर्थात् द्वैत स्वीकार करते हैं, उन अजाति से भय माननेवाले श्रद्धालु और सन्मार्गावलम्बी पुरुषों को जातिदोष-जाति की उपलब्धि के कारण होनेवाले दोष सिद्ध नहीं होंगे, क्योंकि वे विवेकमार्ग में प्रवृत्त हैं ।

और यदि कुछ दोष होगा भी तो वह भी अल्प ही होगा; अर्थात् केवल सम्यग्दर्शन की अप्राप्ति के कारण होनेवाला दोष ही होगा ॥ ४३ ॥

संस्कृत भाष्य पढ़ें

ये चैवमुपलम्भात्समाचाराच्चाजातेरजातिवस्तुनस्त्रसन्तोऽस्तिवस्त्वित्यद्वयादात्मनो वियन्ति विरुद्धं यन्ति द्वैतं प्रतिपद्यन्त इत्यर्थः । तेषामजातेस्त्रसतां श्रद्दधानानां सन्मार्गावलम्बिनां जातिदोषा जात्युपलम्भकृता दोषा न सेत्स्यन्ति सिद्धिं नोपयास्यन्ति, विवेकमार्गप्रवृत्तत्वात् ।

यद्यपि कश्चिद्दोषः स्यात्सोऽप्यल्प एव भविष्यति । सम्यग्दर्शनाप्रतिपत्तिहेतुक इत्यर्थः ॥ ४३ ॥


उपलब्धि और आचरण की अप्रमाणता

यदि कहो कि उपलब्धि और आचरण तो प्रमाण हैं, इसलिये द्वैतवस्तु है ही तो ऐसी बात नहीं है; क्योंकि उपलब्धि और आचरण का तो व्यभिचार भी होता है । किस प्रकार व्यभिचार होता है? सो बतलाया जाता है—
संस्कृत भाष्य पढ़ें
ननुपलम्भसमाचारयोः प्रमाणत्वादस्त्येव द्वैतं वस्त्विति, न; उपलम्भसमाचारयोर्व्यभिचारात् । कथं व्यभिचार इत्युच्यते—