अलातशान्ति प्रकरण - कारिका 44

उपलम्भात्समाचारान्मायाहस्ती यथोच्यते ।
उपलम्भात्समाचारादस्ति वस्तु तथोच्यते ॥ ४४ ॥

upalambhātsamācārānmāyāhastī yathocyate .
upalambhātsamācārādasti vastu tathocyate .. 44 ..


उपलब्धि और आचरण के कारण जिस प्रकार मायाजनित हाथी को [‘हाथी है’—इस प्रकार] कहा जाता है उसी प्रकार उपलब्धि और आचरण के कारण ‘वस्तु है’ ऐसा कहा जाता है ॥ ४४ ॥

हाथी के समान ही मायाजनित हाथी भी देखने में आता है । हाथी के समान ही यहाँ [मायाहस्ती के साथ] भी बन्धन आरोहण आदि हस्तिसम्बन्धी धर्मोंद्वारा व्यवहार करते हैं । जिस प्रकार असत् होने पर भी वह ‘हाथी है’ ऐसा कहा जाता है, उसी प्रकार उपलब्धि और आचरण के कारण भेदरूप द्वैतवस्तु है—ऐसा कहा जाता है ।

अतः अभिप्राय यह है कि उपलब्धि और आचरण द्वैत वस्तु के सद्भाव में कारण नहीं है ॥ ४४ ॥

संस्कृत भाष्य पढ़ें

उपलभ्यते हि मायाहस्ती हस्तीव हस्तिनमिवात्र समाचरन्ति, बन्धनारोहणादिहस्तिसम्बन्धिभिर्धर्मैर्हस्तीति चोच्यतेऽसन्नपि यथा तथैवोपलम्भात्समाचाराद्द्वैतं भेदरूपमस्ति वस्त्वित्युच्यते ।

तस्मान्नोपलम्भसमाचारौ द्वैतवस्तुसद्भावे हेतू भवत इत्यभिप्रायः ॥ ४४ ॥


परमार्थ वस्तु क्या है?

अच्छा तो जिसके आश्रय से जाति आदि असद्बुद्धियाँ होती हैं वह परमार्थ वस्तु क्या है? इसपर कहते हैं—
संस्कृत भाष्य पढ़ें
किं पुनः परमार्थसद्वस्तु यदास्पदा जात्याद्यसद्बुद्धय इत्याह—