अजाचलमवस्तुत्वं विज्ञानं शान्तमद्वयम् ॥ ४५ ॥
jātyābhāsaṃ calābhāsaṃ vastvābhāsaṃ tathaiva ca .
ajācalamavastutvaṃ vijñānaṃ śāntamadvayam .. 45 ..
जो अजाति होकर भी जातिवत् प्रतीत हो उसे जात्याभास कहते हैं; उसका उदाहरण, जैसे—देवदत्त उत्पन्न होता है । जो चल के समान प्रतीत हो उसे चलाभास कहते हैं; जैसे—वही देवदत्त जाता है । ‘वस्त्वाभासम्’—वस्तु धर्मी द्रव्य को कहते हैं, जो उसके समान प्रतीत हो वह वस्त्वाभास है । जैसे—वही देवदत्त गौर और दीर्घ है । देवदत्त उत्पन्न होता है, चलता है तथा वह गौर और दीर्घ है—इस प्रकार भासता है, किन्तु परमार्थतः तो अज, अचल, अवस्तुत्व और अद्रव्यत्व ही है ।
ऐसा वह कौन है? [इसपर कहते हैं] विज्ञान अर्थात् विज्ञप्ति तथा वह जाति आदि से रहित होने के कारण शान्त है और इसी से अद्वय भी है—ऐसा इसका तात्पर्य है ॥ ४५ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
अजाति सञ्जातिवदवभासत इति जात्याभासम् । तद्यथा देवदत्तो जायत इति । चलाभासं चलमिवाभासत इति । यथा स एव देवदत्तो गच्छतीति । वस्त्वाभासं वस्तु द्रव्यं धर्मि तद्वदवभासत इति वस्त्वाभासम् । यथा स एव देवदत्तो गौरो दीर्घ इति । जायते देवदत्तः स्पन्दते दीर्घो गौर इत्येवमवभासते । परमार्थतस्त्वजमचलमवस्तुत्वमद्रव्यं च ।
किं तदेवंप्रकारम्? विज्ञानं विज्ञप्तिः । जात्यादिरहितत्वाच्छान्तम् । अत एवाद्वयं च तदित्यर्थः ॥ ४५ ॥