अलातशान्ति प्रकरण - कारिका 46

एवं न जायते चित्तमेवं धर्मा अजाः स्मृताः ।
एवमेव विजानन्तो न पतन्ति विपर्यये ॥ ४६ ॥

evaṃ na jāyate cittamevaṃ dharmā ajāḥ smṛtāḥ .
evameva vijānanto na patanti viparyaye .. 46 ..


इस प्रकार चित्त उत्पन्न नहीं होता; इसी से आत्मा अजन्मा माने गये हैं । ऐसा जाननेवाले लोग ही भ्रम में नहीं पड़ते ॥ ४६ ॥

इस प्रकार उपर्युक्त हेतुओं से ही चित्त का जन्म नहीं होता और इसी से ब्रह्मवेत्ताओं ने धर्म यानी आत्माओं को अजन्मा माना है । भिन्न-भिन्न देहों का अनुवर्तन करनेवाला होने से एक अद्वितीय आत्मा के लिये ही उपचार से ‘धर्माः’ इस बहुवचन का प्रयोग किया गया है ।

इसी प्रकार—उपर्युक्त विज्ञान को अर्थात् जाति आदिरहित अद्वितीय आत्मतत्त्व को जाननेवाले बाह्य एषणाओं से मुक्त हुए लोग फिर विपर्यय अर्थात् अविद्यारूप अन्धकार के समुद्र में नहीं गिरते । “उस अवस्था में एकत्व देखनेवाले पुरुष को क्या मोह और क्या शोक हो सकता है? ” इत्यादि मन्त्रवर्ण से यही बात प्रमाणित होती है ॥ ४६ ॥

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एवं यथोक्तेभ्यो हेतुभ्यो न जायते चित्तमेवं धर्मा आत्मानोऽजाः स्मृता ब्रह्मविद्भिः । धर्मा इति बहुवचनं देहभेदानुविधायित्वादद्वयस्यैवोपचारतः ।

एवमेव यथोक्तं विज्ञानं जात्यादिरहितमद्वयमात्मतत्त्वं विजानन्तस्त्यक्तबाह्यैषणाः पुनर्न पतन्त्यविद्याध्वान्तसागरे विपर्यये । “तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः” (ई० उ० ७) इत्यादिमन्त्रवर्णात् ॥ ४६ ॥

विज्ञानाभास में अलातस्फुरण का दृष्टान्त

पूर्वोक्त परमार्थज्ञान का ही विस्तार से निरूपण करेंगे, इसलिये कहते हैं—
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यथोक्तं परमार्थदर्शनं प्रपञ्चयिष्यन्नाह—