ऋजुवक्रादिकाभासमलातस्पन्दितं यथा ।
ग्रहणग्राहकाभासं विज्ञानस्पन्दितं तथा ॥ ४७ ॥
ग्रहणग्राहकाभासं विज्ञानस्पन्दितं तथा ॥ ४७ ॥
ṛjuvakrādikābhāsamalātaspanditaṃ yathā .
grahaṇagrāhakābhāsaṃ vijñānaspanditaṃ tathā .. 47 ..
जिस प्रकार अलात (उल्का)-का घूमना ही सीधे-टेढ़े आदि रूपों में भासित होता है, उसी प्रकार विज्ञान का स्फुरण ही ग्रहण और ग्राहक आदि रूपों में भास रहा है ॥ ४७ ॥
जिस प्रकार लोक में सीधे-टेढ़े आदि रूपों में भासमान होनेवाला अलात का स्पन्द अर्थात् उल्का (जलती हुई बनैती)-का घूमना ही है, उसी प्रकार ग्रहण और ग्राहकरूप से भासनेवाला अर्थात् इन्द्रिय और विषयरूप से भासनेवाला भी है । वह कौन है? विज्ञान का स्पन्द, जो अविद्या के कारण ही स्पन्द के समान स्पन्द-सा प्रतीत होता है, वस्तुतः अविचल विज्ञान का स्पन्दन नहीं हो सकता, क्योंकि [उपर्युक्त श्लोक ४५ में ही] ‘वह अज और अचल है’ ऐसा कहा जा चुका है ॥ ४७ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
यथा हि लोक ऋजुवक्रादिप्रकाराभासमलातस्पन्दितमुल्काचलनं तथा ग्रहणग्राहकाभासं विषयिविषयाभासमित्यर्थः । किं तद्विज्ञानस्पन्दितम् । स्पन्दितमिव स्पन्दितमविद्यया । न ह्यचलस्य विज्ञानस्य स्पन्दनमस्ति । अजाचलमिति ह्युक्तम् ॥ ४७ ॥