अलातशान्ति प्रकरण - कारिका 48

अस्पन्दमानमलातमनाभासमजं यथा ।
अस्पन्दमानं विज्ञानमनाभासमजं तथा ॥ ४८ ॥

aspandamānamalātamanābhāsamajaṃ yathā .
aspandamānaṃ vijñānamanābhāsamajaṃ tathā .. 48 ..


जिस प्रकार स्पन्दनरहित अलात आभासशून्य और अज है, उसी प्रकार स्पन्दनरहित विज्ञान भी आभासशून्य और अज है ॥ ४८ ॥
जिस प्रकार वही अलात अस्पन्दमान—स्पन्दन से रहित होने पर ऋजु आदि आकारों में भासित न होने के कारण अनाभास और अज रहता है उसी प्रकार अविद्या से स्पन्दित होनेवाला विज्ञान अविद्या की निवृत्ति होने पर जाति आदि रूप से स्पन्दित न होकर अनाभास, अज और अचल हो जायगा—ऐसा इसका तात्पर्य है ॥ ४८ ॥
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अस्पन्दमानं स्पन्दनवर्जितं तदेवालातमृज्वाद्याकारेणाजायमानमनाभासमजं यथा; तथाविद्यया स्पन्दमानमविद्योपरमेऽस्पन्दमानं जात्याद्याकारेणानाभासमजमचलं भविष्यतीत्यर्थः ॥ ४८ ॥

इसके सिवा—
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किं च—