अलातशान्ति प्रकरण - कारिका 49

अलाते स्पन्दमाने वै नाभासा अन्यतोभुवः ।
न ततोऽन्यत्र निस्पन्दान्नालातं प्रविशन्ति ते ॥ ४९ ॥

alāte spandamāne vai nābhāsā anyatobhuvaḥ .
na tato’nyatra nispandānnālātaṃ praviśanti te .. 49 ..


अलात के स्पन्दित होने पर भी वे आभास किसी अन्य कारण से नहीं होते, तथा उसके स्पन्दरहित होने पर भी कहीं अन्यत्र नहीं चले जाते और न वे अलात में ही प्रवेश करते हैं ॥ ४९ ॥
उस अलात के स्पन्दित होने पर भी वे सीधे-टेढ़े आदि आभास अलात से भिन्न कहीं अन्यत्र से आकर अलात में उपस्थित नहीं हो जाते; अतः वे किसी अन्य से होनेवाले भी नहीं हैं तथा निस्पन्द हुए उस अलात से वे कहीं अन्यत्र नहीं चले जाते और न उस निस्पन्द अलात में ही प्रवेश कर जाते हैं ॥ ४९ ॥
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तस्मिन्नेवालाते स्पन्दमाने ऋजुवक्राद्याभासा अलातादन्यतः कुतश्चिदागत्यालाते नैव भवन्ति, इति नान्यतोभुवः । न च तस्मान्निस्पन्दादलातादन्यत्र निर्गताः । न च निस्पन्दमलातमेव प्रविशन्ति ते ॥ ४९ ॥

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किं च—