अलातशान्ति प्रकरण - कारिका 53

द्रव्यं द्रव्यस्य हेतुः स्यादन्यदन्यस्य चैव हि ।
द्रव्यत्वमन्यभावो वा धर्माणां नोपपद्यते ॥ ५३ ॥

dravyaṃ dravyasya hetuḥ syādanyadanyasya caiva hi .
dravyatvamanyabhāvo vā dharmāṇāṃ nopapadyate .. 53 ..


द्रव्य का कारण द्रव्य ही हो सकता है और वह भी अन्य द्रव्य का अन्य ही द्रव्य कारण होना चाहिये; किन्तु आत्माओं में द्रव्यत्व और अन्यत्व दोनों ही सम्भव नहीं हैं ॥ ५३ ॥
अन्य द्रव्य का कारण अन्य द्रव्य ही हो सकता है, न कि उस द्रव्य का वही । और जो वस्तु द्रव्य नहीं है उसे लोक में किसीका स्वतन्त्र कारण होता नहीं देखा । तथा आत्माओं का द्रव्यत्व अथवा अन्यत्व किसी भी प्रकार सम्भव नहीं है, जिससे कि वे किसी अन्य द्रव्य के कारणत्व अथवा कार्यत्व को प्राप्त हो सकें । अतः तात्पर्य यह है कि अद्रव्यत्व और अनन्यत्व के कारण आत्मा किसीका भी कार्य अथवा कारण नहीं है ॥ ५३ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
द्रव्यं द्रव्यस्यान्यस्यान्यद्धेतुः कारणं स्यान्न तु तस्यैव तत् । नाप्यद्रव्यं कस्यचित्कारणं स्वतन्त्रं दृष्टं लोके । न च द्रव्यत्वं धर्माणामात्मनामुपपद्यतेऽन्यत्वं वा कुतश्चिद्येनान्यस्य कारणत्वं कार्यत्वं वा प्रतिपद्येत । अतोऽद्रव्यत्वादनन्यत्वाच्च न कस्यचित्कार्यं कारणं वात्मेत्यर्थः ॥ ५३ ॥