एवं न चित्तजा धर्माश्चित्तं वापि न धर्मजम् ।
एवं हेतुफलाजातिं प्रविशन्ति मनीषिणः ॥ ५४ ॥
एवं हेतुफलाजातिं प्रविशन्ति मनीषिणः ॥ ५४ ॥
evaṃ na cittajā dharmāścittaṃ vāpi na dharmajam .
evaṃ hetuphalājātiṃ praviśanti manīṣiṇaḥ .. 54 ..
इस प्रकार न तो बाह्य पदार्थ ही चित्त से हुए हैं और न चित्त ही बाह्य पदार्थों से उत्पन्न हुआ है । अतः मनीषी लोग कार्य-कारण की अनुत्पत्ति ही निश्चित करते हैं ॥ ५४ ॥
इस प्रकार उपर्युक्त हेतुओं से चित्त आत्मविज्ञानस्वरूप ही है; न तो बाह्य पदार्थ ही चित्त से उत्पन्न हुए हैं और न चित्त ही बाह्य पदार्थों से उत्पन्न हुआ है; क्योंकि सारे ही धर्मविज्ञानस्वरूप के आभासमात्र हैं । इस प्रकार न तो हेतु से फल की उत्पत्ति होती है और न फल से हेतु की । अतः मनीषी लोग हेतु और फल की अनुत्पत्ति ही निश्चित करते हैं । तात्पर्य यह कि ब्रह्मवेत्ता लोग आत्मा में हेतु और फल का अभाव ही देखते हैं ॥ ५४ ॥
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एवं यथोक्तेभ्यो हेतुभ्य आत्मविज्ञानस्वरूपमेव चित्तमिति न चित्तजा बाह्यधर्मा नापि बाह्यधर्मजं चित्तम् ।
विज्ञानस्वरूपाभासमात्रत्वात्सर्वधर्माणाम् । एवं न हेतोः फलं जायते नापि फलाद्धेतुरिति हेतुफलयोरजातिं हेतुफलाजातिं प्रविशन्त्यध्यवस्यन्ति । आत्मनि हेतुफलयोरभावमेव प्रतिपद्यन्ते ब्रह्मविद इत्यर्थः ॥ ५४ ॥
हेतु-फलभाव के अभिनिवेश का फल
किन्तु जिनका हेतु और फल में अभिनिवेश है उनका क्या होगा? इसपर कहा जाता है—धर्माधर्मसंज्ञक हेतु का मैं कर्ता हूँ, धर्म और अधर्म मेरे हैं, कालान्तर में किसी प्राणी के शरीर में उत्पन्न होकर उनका फल भोगूँगा—इस प्रकार—
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ये पुनर्हेतुफलयोरभिनिविष्टास्तेषां किं स्यादित्युच्यते—धर्माधर्माख्यस्य हेतोरहं कर्ता मम धर्माधर्मौ तत्फलं कालान्तरे क्वचित्प्राणिनिकाये जातो भोक्ष्य इति—